महावीर कर्ण के वे सच जो साबित करते हैं कि वह असाधारण व्यक्ति थे !

जब हम महाभारत के बारे में बात करते हैं तो हम भगवान कृष्ण, अर्जुन और युधिष्ठर को याद करते हैं और फिर कौरव बुरे लोग और हम जिस चरित्र के बारे में कम से कम बात करते हैं वह कर्ण है. दुर्भाग्यपूर्ण लड़का राजा और एक ऐसा आदमी जिसे कई बार गलती से शाप दिया गया था, लेकिन महाभारत में कर्ण की भूमिका एक महत्वपूर्ण है. हम आपको ‘सूर्यपुत्र’ के बारे में ११ अज्ञात कहानियां हैं जो साबित करते है की वह नायक से कम कुछ नहीं था.

१. युधिष्ठिर की तुलना में कर्ण तेज था

Yudhisthir kuchhnya

 

एक बार अर्जुन ने भगवान कृष्ण से पूछा कि युधिष्ठिर को धर्मराज और कर्ण को दानवीर क्यों बुलाया जाता हैं. इस सवाल का उत्तर देने के लिए, कृष्ण और अर्जुन ने ब्राह्मणों का रूप धारण किया और दोनों राजाओं के यहाँ का दौरा करने का फैसला किया. युधिष्ठिर की यात्रा पर उन्होंने खाना पकाने के लिए चंदन की मांग की. उस समय भारी बारिश हो रही थी और युधिष्ठिर को ईंधन के रूप में उपयोग करने योग्य सूखा चंदन का पता नहीं लगा. उसने उन दोनों से माफी मांगी और वे खाली हाथ वापस लौट आए.

थोड़ी देर बाद वे कर्ण के पास गए और एक ही बात के लिए पूछा. कर्ण सूखा चंदन के लिए हर जगह खोजी लेकिन असफल रहे. लेकिन उन्होंने ब्राह्मणों को घर से खाली हाथों नहीं जाने दिया. उसने अपना धनुष और तीर उठाया और चन्दन का दरवाजा तोड़ दिया। यह उन्होंने कृष्ण और अर्जुन को दिया.

२. ऋषि परशुराम ने कर्ण को शाप दिया था, हालांकि वह अपनी असली विरासत से अवगत थे

The Parshuram kuchhnaya

ऋषि परशुराम ने उसे धोखा देने के लिए कर्ण को शाप दिया था. कर्ण ने झूठा दावा किया था कि वह एक ब्राह्मण था. उसने झूठ बोला था क्योंकि वह सबसे महान शिक्षक से तीरंदाजी सीख सकता था. लेकिन इसका परिणाम विपरीत हुआ, हालांकि, परशुराम कर्ण की असली विरासत को जानते थे. लेकिन वह आनेवाले कल से भी अवगत थे.

३.कर्ण केवल धर्म से ही दुर्योधन के साथ नहीं थे, बल्कि दुर्योधन का अटूट विश्वास कर्ण को हमेशा प्रेरित करता था 

Karn and Duryodhan kuchhnaya

कर्ण राज्याभिषेक के बाद अपना अधिकांश समय दुर्योधन के साथ बिताते थे. वे दोनों पासे का खेल खेलते थे. एक दिन सूर्यास्त के बाद, दुर्योधन को खेल क्षणभर छोड़कर जाना पड़ा. तब उनकी पत्नी भानुमती वहां से गुजर रही थी. कर्ण को दुर्योधन का इंतजार करते देख उसने अपने पति के खेल को जारी रखने का फैसला किया. कुछ क्षण उपरांत किसकी खेलने की अगली बारी है इस बात पर एक आकस्मिक झगड़े में कर्ण ने भानुमती के हाथ से पासा छीनने की कोशिश की. इसमें उसके मोती का हार टूट गया.

फर्श पर हर जगह मोती बिखरे. उस पल में दुर्योधन ने प्रवेश किया और अपनी पत्नी को एक अजीब स्थिति में अपने मित्र के साथ कपड़ों को उलझा पाया और पूरे फर्श पर मोती की लड़ियाँ. दुर्योधन ने कर्ण से झगड़े का कारण पूछा उसे जानने के बाद उन्होंने मजाक उड़ाया और जोर से हँसे और खेल जारी रखा.

बाद में जब भानुमती ने दुर्योधन से पूछा की उसने संदेह क्यों नहीं किया तब दुर्योधन ने जवाब में कहा यहाँ संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है. क्योंकि जब संदेह होता है तब कोई रिश्ता नहीं होता. कर्ण मेरा सबसे अच्छा दोस्त है और मैं उस पर भरोसा करता हूं क्योंकि मुझे विश्वास है कि वह कभी भी मेरा विश्वास नहीं तोड़ेगा”

४. महाभारत में कर्ण निर्विवाद रूप से सबसे शक्तिशाली व्यक्ति है.

वास्तव में यहां तक कि खुद अर्जुन भी कर्ण को नहीं हरा सकता था. कुरुक्षेत्र में युद्ध के दौरान कृष्ण और इंद्र ने पांडवों को कर्ण को मारने में मदद की. युद्धक्षेत्र में कृष्ण ने अर्जुन के लिए सारथी के रूप में प्रवेश किया था, जबकि इंद्र ने कर्ण से कवच को हटा लिया, अर्जुन के लिए रास्ता साफ कर दिया था.

५. दुर्योधन ने कर्ण के लिये जो कुछ किया, उस सब के लिये कर्ण अंत तक दुर्योधन का एहसानमंद रहा.

युद्ध से पहले कृष्ण ने कर्ण का सामना किया और उन्हें बताया कि वह पांडवों के सबसे बड़े, और सिंहासन का सही वारिस हैं युधिष्ठिर नहीं ! कर्ण को पता चला कि कुंती उनकी मां थीं और उनके पिता सूर्य थे तो दुर्योधन की दोस्ती और निष्ठा के कारण उन्होंने पांडवों के साथ शामिल होने से इनकार कर दिया. सही शब्दों में कर्ण ही एकमात्र एक था जिन्होंने पूरे जीवन में धर्म का पालन किया.

६. भगवान कृष्ण ने कई अवसरों पर कर्ण की प्रशंसा की थी.

Lord Krishna and Karn kuchhnaya

युद्ध के मध्य में कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि कर्ण वास्तव में एक असली योद्धा था, और उससे कहीं बेहतर हैं कर्ण हमें यह याद दिलाता है कि “कठिन समय कभी खत्म नहीं होता लेकिन कठिन लोग हमेशा तैयार रहते हैं.”

७. महाभारत में कर्ण की ज़िंदगी में अधिक त्रासदी थी.

कर्ण का जीवन त्रासदी की विभिन्न लहरों के माध्यम से गुजरा और गलत रवैया की वजह से जीवन नष्ट हो गया. क्योंकि वह जो नहीं था वह बनना चाहता था. वह जानता था कि दुर्योधन जो कर रहा था वह गलत था परन्तु वह एक सक्रिय प्रतिभागी थे जिन्होंने दुर्योधन का अंतहीन समर्थन किया था. कर्ण की वफादारी और कृतज्ञता ही उसके लिए सब कुछ था.

८. भगवान कृष्ण ने अनुरोध किया था कि कर्ण भारत का राजा बन जाए

कृष्ण के अनुसार युद्ध से बचने के लिए उसने कर्ण को राजा बनने के लिए अनुरोध किया था. उन्होंने तर्क दिया कि कर्ण, युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों से बड़े होने के नाते सिंहासन के सही वारिस होंगे. लेकिन कर्ण ने इस प्रस्ताव से इनकार कर दिया.

९. कर्ण हमेशा जानता था कि पांडव कुरुक्षेत्र के युद्ध जीतेंगे

भगवान कृष्ण ने पूछा कि वे कैसे जानते है कि पांडव युद्ध जीतेंगे जिस पर उन्होंने उत्तर दिया ! “कुरुक्षेत्र एक बलि चढ़ाव है. अर्जुन प्रमुख पुजारी है, आप कृष्ण ही अध्यक्ष हैं मैं खुद (कर्ण), भीष्म देव, द्रोणाचार्य और दुर्योधन बलिदान हैं.” आप पांडवों में से सबसे अच्छे हैं, यह कहकर कृष्ण ने अपनी बातचीत समाप्त कर दी.

१०. कुछ सिद्धांतों का कहना है कि कर्ण भगवान कृष्ण की रचना थी

भगवान कृष्ण ने बलिदान का सच्चा अर्थ दिखाने के लिए कर्ण बनाया और कैसे अपने भाग्य का स्वीकार करना चाहिए. दुर्भाग्य या बुरे समय के बावजूद वह आध्यात्मिकता, उदारता, नम्रता, गरिमा और आत्म सम्मान में विश्वास करते थे और अपने प्रियजनों के प्रति सम्मान बनाये रखा.

११. कर्ण राधा के पुत्र और दुनिया उन्हें राधेय के रूप में याद करने की उनकी कामना थी.

कर्ण की जन्मदाता मां कुंती थी लेकिन यह पता चलने के बाद भी वह राधा के पुत्र राधेय के रूप में याद करना चाहते थे. कुन्ती के पुत्र कौन्तेय के रूप में नहीं.

महावीर कर्ण को नमन!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *