पंच महाभूतों का प्रतिक है ये शिव मंदिर जानिए कहाँ है ये ?

हमारे भारत में कही भी जाइए, आपको मंदिर दिखाई नही देगा, ऐसे तो कभी हो ही नही सकता हैं. हर जगह, छोटा क्यों न हो, लेकिन मंदिर तो होगा ही. ऐसे ही, कोई मंदिर आधुनिक, तो कोई अतिप्राचीन है. कई तो इतने प्राचीन है कि उनसे संबंधित डोर हमे सीधे राजा महाराजाओं के दौर में ले जाती है. वैसे तो अपने यहाँ सभी देवताओं के मंदिर पाए जाते है, लेकिन अगर आप गौर से सोचेंगे तो आप के ध्यान मे आयेगा के भारत में शंकर भगवान जी के मंदिर अधिक है. वास्तव में यह मंदिर कितने होंगे इस विषय में जाने की जरूरत नहीं है. विभिन्न नाम से ही क्यों न हो, शिवशम्भू जी के मंदिर अधिक से अधिक देखने मिलते है.

 

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हिन्दू धर्म में भगवान शंकरजी का स्थान काफी उंचा और महत्वपूर्ण है. विश्व का रचैता ब्रह्मा, विश्व का रक्षण कर्ता विष्णु – इनके बाद पंचभूतधारक भगवान शंकर पूजनीय है. पृथ्वी, जल, अग्नी, हवा और आकाश – सृष्टि के इन पाँच मुलभुत तत्वों को पंचभूतधारक कहा जाता है. उनका नियंत्रण भगवान शंकरजी करते है, ऐसा माना जाता है.

दक्षिण भारत में पांच मंदिर है जिन्हें इन्ही पंचमहाभूतोंके प्रतीक माना जाता है. इन्हें ‘पंचमहाभूत स्थल’ इस नाम से भी पहचना जाता हैं. यह पाँचो मंदिर भगवान शंकरजी को समर्पित है मतलब यहाँ भगवान शंकरजी की पूजा की जाती हैं. इन पाँच मंदिरों में से चार मंदिर तमिलनाडु राज्य में हैं, तो एक मंदिर आंध्रप्रदेश में हैं. दक्षिण भारत में रहने वाले भक्तों के मन में, इन पांच मंदिरों के प्रति बहुत आस्था है.

थिरूवनाईकावल मंदिर के अंदरूनी हिस्से में पानी टपकता हैं – जो पानी का अस्तित्व दर्शाता हैं. इसीलिए यह मंदिर पानी इस तत्व का प्रतीक हैं.

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थिरुवन्नामलाई मंदिर में हर साल कार्तिकाई दिपम नामक समारोह मनाया जाता हैं. इस समारोह में अन्नामलाई पहाड़ के सिर पर एक बहुत बड़ा दीप प्रज्वलित किया जाता हैं. यह दीप अग्नी का अस्तित्व दर्शाता हैं. इसीलिए यह मंदिर अग्नी तत्व का प्रतीक हैं.

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श्रीकालहस्ती मंदिर में ‘लहराता हुआ दिया’ हैं जो कि हवा अस्तित्व दर्शाता हैं. इसीलिए यह मंदिर हवा तत्व का प्रतीक हैं.

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कांचीपुरम एकंबरेश्वर मंदिर का मिट्टीका स्वयंभू लिंग पृथ्वी का अस्तित्व दर्शाता हैं. इसीलिए यह मंदिर पृथ्वी इस तत्व का प्रतीक हैं.

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और चिंबरम नटरंजन मंदिर का प्राचीन ग्रंथों में वास्तव में ‘अनादी अनंत’ ऐसा वर्णन किया गया हैं. यह वर्णन आकाश का अस्तित्व दर्शाता हैं, इसीलिए यह मंदिर आकाश इस तत्व का प्रतीक हैं.

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इन पाँचो ही मंदिरों की विशेष बात यह है की इन पाँचो ही मंदिरों को यौगिक विज्ञान अनुसार स्थित किया गया हैं. इसीलिए इन सभी मंदिरों की भौगोलिक स्तिथि देखते हुए यह मंदिरे एक दूसरे से भौगोलिक प्रभागों में जोड़ी हुई पाई जाती हैं.

पाँच में से तीन मंदिर बराबर ७९ अंश ४१ मि पूर्त रेखांश में एक ही पंक्ति में स्तिथ हैं. चिदंबरम नटराजना, कांचीपुरम एकंबरेश्वर और श्रीकालहस्ती – यह तीनो मंदिर एक ही रेखा मे स्थित है!

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थिवन्नाईकावल मंदिर और तिरुवन्नामलाई मंदिर यह बचे हुए मंदिर हैं लेकिन इस लाइन से दूर हैं. ऐसा क्यों यह भी एक परेशान करनेवाला प्रश्न हैं.

सबसे महत्वपूर्ण बात – एक ही रेखा में स्थित यह मंदिर एक हजार साल पहले निर्माण किये गये हैं. उस दौरान किसी भी प्रकार की सँटेलाइट टेक्नोलॉजी नही थी. फिर भी मंदिर निर्माण करने वालों ने इन मंदिरों एक ही पंक्ति में कैसे स्तिथ कीया हैं यह एक न सुलजनेवाली पहेली हैं.

इसे एक प्रकार का अभियांत्रिकी, ज्योतिषी और भौगोलिक करिष्मा ही कहा जा सकता हैं…!

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