मनमोहन सिंह के “उस” बजट के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था हमेशा के लिए बदल गई!

भारत के पूर्व प्रधान मंत्री और वित्त मंत्री रह चुके मनमोहन सिंह ने नोटबंदी पर संसद में किया हुआ भाषण नोटाबंदी के निर्णय के बाद सभी जगह चर्चा में था. कोई कह रहा था की उन्होंने योग्य प्रश्न उपस्थित किए, कोई कह रहा था की उन्होंने उनके समय में कुछ किया नही और अब आए हमे सिखाने! यह दोनो वर्ग कौनसे यह आपको अलग से बताने की जरूरत नही है. अच्छा इन दो वर्गों की चर्चा का मुद्दा मतलब मनमोहन सिंह का भाषण हम बाजू में रखतें हैं. वह लफडा दूसरों को सुलझाने दें. यह मनमोहन सिंह मतलब दुनिया में प्रतिष्ठित अर्थतज्ज्ञों में से एक! आपने भी सुना होगा की खुदतत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदींजी ने मनमोहन सिंह को आर्थिक उपदेशक के तौर पे कार्यभार संभालने की बिनती की थी. ऐसे इस अर्थविद्वान पंडित ने २४ जुलै १९९१ रोज एक बजट (अर्थसंकल्प) प्रस्तुत किया था, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था हमेशा के लिए बदल गई.

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१९९०-९१ साल में भारत में बहुत राजकीय अस्थिरता निर्माण हुई थी. व्ही.पि. सिंह की सरकार गिर गया थी. चंद्रशेखर का सरकार भी ज्यादा देर टिक नही पाया. उसी वर्ष में जून में राजीव गांधी की हत्या हुई. यह सर्व अस्थिरता देख अनिवासी (NRI) भारतीयों ने अपनी सारी सरकारी जमापुंजी निकाल ली. और उस कारण देश की तिजोरी में केवल एक अरब डॉलर इतनाही परकीय चलन बाकी रहा. भारत ज्यादा से ज्यादा केवल १५ दिन आयात कर सकता था इतनी यह रकम कम थी. आंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपया भयंकर स्तर पर गिर गया. केंद्र सरकार की व्यापार में ८.४ प्रतिशत हानि तो केंद्र और राज्य सरकार की व्यापार में १२.७ प्रतिशत तक हानि हो चुकी थी. मतलब सरकारी हानि और उसके परिणाम स्वरूप महंगाई सीमा पार कर गई थी. ऐसे समय में भारत ने आंतरराष्ट्रीय चलन निधी के पास अधिक कर्ज की मांग की. तभी नियम के अनुसार ६७ टन सोना गिरवी रखने के बाद भारत को कर्ज मिला था. इस प्रकार से सभी बाजूंओ से आर्थिक विवंचना में फसे अपने देश को जरूरत थी भारी आर्थिक उपयोजनांओ की जो कमसे कम अगले ५० वर्षों तक भारत का आर्थिक दिवाला नही होने देती. और इन उपाययोजनांओ को निश्चित करने की मदार थी केंद्रीय अर्थमंत्री मनमोहन सिंह के कंधों पर!

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२४ जुलाई १९९१ रोज मनमोहन सिंह ने संसद में प्रवेश किया और सबकी नजरे उन्ही पर टिकी रही. संपूर्ण मीडिया  में एक हि प्रश्न पूछा जा रहा था की मनमोहन सिंह देश को आर्थिक संकट से बचाने के लिए आखिर क्या करेंगे? मनमोहन सिंह के पिटारे से कौनसी चीजे बाहर निकलती हैं यह जानने के लिए हर कोई उत्सुक था. आखिर वो क्षण आया और मनमोहन सिंह ने उनके अर्थक्षेत्र की पांडित्य के जोर पर भारतीय अर्थव्यवस्था की सुधारणा के लिए तैयार किया हुआ अनुरूप अर्थसंकल्प बाहर निकाला और उसे जनता के सामने आत्मविश्वास से सादर किया. इस अर्थसंकल्प में एक चीज सबसे लक्षणीय थी और वह है –  आर्थिक उदारीकरण (liberalisation)! इस बार इस उदारीकरण को २५ वर्ष पूरे हुए.

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आर्थिक उदारीकरण मतलब नीजी क्षेत्र के लिए अर्थव्यवस्था के द्वार पूरी तरह से खोल देना. नीजी क्षेत्र के उपर के निर्बंध कम करके अथवा पूर्णत: निकाल कर उन्हे निवेश के लिए पोषक वातावरण उपलब्ध करा देना, जिससे नीजी क्षेत्र में खास कर परकीय निवेश निर्माण हो और उसका फायदा सीधे देश की जनता और अर्थव्यवस्था को  हो ताकि दिवाला निकालने के करीब आए हुए देश को आर्थिक आधार मिले और वह नए दम से फिर एक बार अपने पैरों पर खडा रहें. यह है इस आर्थिक उदारीकरण के पिछे का उद्दिष्ट!

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मनमोहन सिंह ने आखिर किया क्या?

मनमोहन सिंह ने विनियंत्रण का पर्व शुरु किया. परमीट राज हमेशा के लिए बंद किया. इस परमिट की झंझट से भारतीय उद्योगक्षेत्र की अधोगती हो रही थी. परन्तु आर्थिक उदारीकरण के कारण सभी उद्योगों को नई चेतना मिली. औद्योगिक परवाना पद्धती बंद कर दी गई. पेट्रोल, डिझेल के साथ अनेक वस्तुओं पर का सरकारी नियंत्रण हटा दिया गया. विदेशी निवेश को मुक्त संमती दे दी गई. आयात कर कम करने की वजह से विदेशी वस्तुए को बड़े पैमाने पर भारतीय बाजार में दाखल होने लगी. MRTP कायदे मे सुधार करने से भारत में स्पर्धात्मक उद्योग शुरु हुए. आयकर और कंपनी कर कम करने से व्यवसाय बढने लगे. उसके बाद वाजपेयी सरकार ने भी आर्थिक उदारीकरण का अध्याय शुरु रखा. २००४ में मनमोहन सिंह पंतप्रधान हुए और उन्होंने फिर एक बार आर्थिक उदारीकरण के धोरण में सुधार किया. उसके परिणाम स्वरूप देश में आयटी क्षेत्र का विकास हुआ.

१९९१ में भारत पर आए आर्थिक संकट की दृष्टी से मनमोहन सिंह ने केंद्रीय अर्थमंत्री के नाते से आर्थिक उदारीकरण का उठाया हुआ कदम योग्य निकला इसके बारे में संदेह नही. १९९१ का वह क्रांतिकारी बजेट निश्चित करने की प्रक्रीया में तत्कालीन पंतप्रधान डॉ. नरसिंह राव इनकी भी अनमोल भूमिका थी. इस जोडी के अर्थपूर्ण बजेट के कारण भारत आर्थिक दिवाले के दरवाजे से वापस आया वह हमेशा के लिए, ऐसा हि कहना पडेगा. क्योंकि तबसे लेकर आज तक भारत कभी-भी आर्थिक दृष्टी से कमजोर नही हुआ, बल्कि हमारे भारत ने विकास की उंगली थामी और आज दुनिया में एक महासत्ता होने की दिशा में हम अग्रसर हो रहे हैं.

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मनमोहन सिंह ने कहा था कि

इस बजेट के दूरगामी परिणाम निश्चित दिखेंगे और वे जनता की भलाई के लिए होंगे.

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और हां, आज इस इन्सान का कहा सच निकला. उनके बजट के कारण भारत पर हुए दूरगामी परिणामों के उदाहरण देने हो तो भरपूर हैं. लेकिन एक प्रभावशाली उदाहरण देना हो तो आज हम ऑनलाईन मार्केटिंग विश्व की तरफ देख सकते हैं. इस ऑनलाईन बाजार से हमारा जीवन कितना सहज और सुखी हुआ है यह आपको अलग से बताने की जरूरत नही!

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