एक ऐसा परिवार जो सिर्फ संस्कृत में करते है बात, पति और पत्नी झगड़ा भी करते है संस्कृत में

आज कल संस्कृत भाषा भले ही स्कूल कालेज के पाठ्यक्रमों का विषय हो मगर इस प्राचीन भाषा का आम बोलचाल में बहुत कम उपयोग होता है. लेकिन दुनिया के इस प्राचीन भाषा को आज भी एक परिवार अपने रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल करता है.

पश्चिम बंगाल के बशीरहाट टाउन में रहने वाले एक पूरा परिवार हिंदी और बंगाली भाषा नहीं बल्कि बच्चे से लेकर बूढ़े तक संस्कृत भाषा में बोलते हैं. यदि पति पत्नी में कोई झगड़ा हो जाए तो झगड़ा भी संस्कृत भाषा में ही होता हैं. इस परिवार के माहौल को देखकर आपको ऐसा लगेगा कि आप दूसरे देश में तो नहीं आ गए.

यह दंपत्ति का नाम प्रणव और मोमिता हैं. दरअसल इन दोनों की शादी 2010 में हुई थी तब से यह दोनों ने ठान लिया था कि अब हम अपनी प्राचीन भाषा संस्कृत में ही बात करेंगे और अपने बच्चों को भी सिखाएंगे. तब से लेकर आज तक यह परिवार संस्कृत में ही बात कर रहे हैं.

संस्कृत से हुआ कई भाषाओँ का जन्म 

संस्कृत (संस्कृतम्) भारतीय उपमहाद्वीप की एक शास्त्रीय भाषा है. इसे देववाणी अथवा सुरभारती भी कहा जाता है. यह विश्व की सबसे पुरानी उल्लिखित भाषा है. आधुनिक भारतीय भाषाएँ जैसे, हिंदी, मराठी, सिन्धी, पंजाबी, नेपाली, आदि इसी से उत्पन्न हुई हैं. इन सभी भाषाओं में यूरोपीय बंजारों की रोमानी भाषा भी शामिल है. संस्कृत में हिन्दू धर्म से सम्बंधित लगभग सभी धर्मग्रन्थ लिखे गये हैं. बौद्ध मत (विशेषकर महायान) तथा जैन मत के भी कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ संस्कृत में लिखे गये हैं. आज भी हिन्दू धर्म के अधिकतर यज्ञ और पूजा संस्कृत में ही होती हैं.

संस्कृत भाषा हमारी धरोहर

आज भौतिक चकाचौंध ने मानव को संस्कारविहीन बना दिया है. हम अपनी संस्कृति को भूलकर पाश्चात्य संस्कृति अपना रहे है और दुखी हो रहे है. संस्कृत भाषा एक ऐसी भाषा है, जिसमे कदम-कदम पर जीवन के संस्कारों का खजाना गड़ा है. इस गड़े धन की परवाह किये बिना हम भौतिकवाद की तरफ भाग रहे है और स्वयं ही दुखी हो रहे है.

भारतीय संस्कृति संस्कृत भाषा में ही निहित है, संस्कृत को देवभाषा कहा गया है. सभी भाषाओँ की जननी भी संस्कृत को ही माना गया है. संस्कृत अर्थात संस्कारों के लिए बनी भाषा ही संस्कृत है. “संस अर्थात संस्कार कृते अर्थात के लिए”

सीमित है संस्कृत भाषा की पढ़ाई 

आज का विद्यार्थी यदि संस्कृत के विषय में सोचता है तो बस १० वी तक तो पढनी है, पास हो जाऊं, बस वह यह नहीं समझ पा रहा है कि संस्कारों का बीज ही उसकी उम्र में ५ वी से १० वी तक बोया जाता है और यदि उसे संस्कृत भाषा रूपी पानी से सिंचित किया गया है तो वह युवाव्स्थाता एक पुष्ट वृक्ष रूप संस्कारों के फल के साथ अपनी सुगंध सभी दिशाओं में फैलाएगा. संस्कृत के श्लोक उसे युवावस्था में अपनी और बरबस आकर्षित करेंगे. युवावस्था में यदि वह माँ का अपमान करता है, तो उसे याद आएगा.

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