कैसे चुने जाते हैं अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष? समझ ले आसान से उदाहरण से

8 नवंबर 2016 के दिन हुआ अमरिकन राष्ट्राध्यक्ष का चुनाव! मतलब दुनिया का सुपर पावर देश चुनेगा धरती का सबसे शक्तिशाली इन्सान! जैसे हि इस चुनाव की तिथी तय करने का एक तरीका है (नवंबर महिने के पहले सोमवार के बाद वाला मंगलवार), उसी तरह चुनाव के मतों की गणना करने की भी एक विशेष पद्धती है. हम एक आसान सा उदाहरण लेकर उसे समझेंगे. ‘राष्ट्राध्यक्ष’ तय करने का यह चुनाव हमारे भारत में हो रहा है – ऐसी कल्पना करके हम अमरिकी चुनाव की प्रणाली का आकलन करनेवाले हैं.

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स्रोत

कल्पना करें की भारत के प्रधानमंत्री अमरिकी चुनाव की पद्धती से चुनने हैं. शुरुआत हमारे महाराष्ट्र से ही करते हैं.

ऐसा समझे की महाराष्ट्र में केवल 4 ही पक्ष हैं भाजप (बीजेपी), शिवसेना, कॉंग्रेस और राष्ट्रवादी कॉंग्रेस (एनसीपी).

महाराष्ट्र प्रधानमंत्री के, मतलब लोकसभा के चुनाव के लिए 48 सांसद चुनता है. चुनाव इन 48 मतदाता क्षेत्रों में होती है. जिस उम्मीदवार को उसके मतदाता क्षेत्र में सबसे ज्यादा मत मिलते हैं वह जीत जाता है. इसे कहते हैं फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टीम. समझ ले भाजप 25, शिवसेना 15, कॉंग्रेस 5 और राष्ट्रवादी कॉंग्रेस 3 मतदाता क्षेत्र में जीत गए. यह आकड़ा फिर हर एक पक्ष के राष्ट्रीय स्तर की आंकडों में मिलाया जाता है और जिस पक्ष का अथवा गठबंधन का आकड़ा कमसे कम 273 होता है उनका प्रधानमंत्री तथा सरकार बनती है. यह आपको पता ही है. यह अपनी भारतीय चुनाव पद्धती है.

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समझ ले कि हमारे यहां अमरिका जैसी चुनाव पद्धती है. उस स्थिती में महाराष्ट्र प्रधानमंत्री के चुनाव के लिए 48 सांसद ही भेजेगा. लेकिन – चुनाव 48 मतदाता क्षेत्र में होने के बजाय महाराष्ट्रभर में ‘एक’ ही चुनाव होगा. मतलब पूरा महाराष्ट्र यह एक मतदाता संघ होगा…!

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समझो महाराष्ट्र में 5 करोड़ लोगों ने मतदान किया, तो उनमें से 2 करोड भाजप को, 1.5 करोड शिवसेना को और कॉंग्रेस व राष्ट्रवादी कॉंग्रेस को प्रत्येकी 75 लाख. भाजपा को सबसे ज्यादा मत मिलने के कारण फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टीम के अनुसार भाजपा महाराष्ट्र जितेगा और सभी के सभी 48 सांसद भाजप के ही रहेंगे…!

वितरण के इस पद्धती को ‘जितनेवाला सब ले जाएगा’ कहते हैं.

वैसे देखा जाए तो अमरिकन और भारतीय चुनाव पद्धती में एक ही फर्क दिखता है. भारत में सांसदो (एमपी) का और अमरिका में निर्वाचकों का (इलेक्टोर्स) वितरण चुनाव में कैसा हो – यह. भारत में आप मतदाता क्षेत्र जीतते हो और अमरिका में आप पूरा राज्य जितते हो. ‘जितनेवाला सब ले जाएगा’ यह सबसे बडा फर्क.

अब थोड़ा भीतर जाते हैं.

 

निर्वाचक मंडल (इलेक्टोरल कॉलेज)

जैसे भारत में एक मतदाता क्षेत्र में चुनाव होता है, वैसे अमरिका में राज्यों में चुनाव होता है. मतलब एक संपूर्ण राज्य ही मतदाता क्षेत्र होता है. अमरिका के हर राज्य के पूर्वनिर्धारित निर्वाचक तय किए जाते हैं. निर्वाचकों की संख्या राज्य की लोकसंख्या के प्रमाण में होती है. हर राज्य का चुनाव होता है और राज्य अपने सभी निर्वाचक (इलेक्टोर्स) उनके उनके राज्य जीतनेवाले पक्ष को देते हैं.

मतलब, उपर का महाराष्ट्र के चुनाव का उदाहरण लें, तो भाजपा को सबसे ज्यादा मत मिलने की वजह से महाराष्ट्र अपने सारे 48 निर्वाचक (इलेक्टोर्स) भाजपा को देगा.

यह निर्वाचकों का गणित अमरिका में कुछ इस प्रकार है –

कॅलिफोर्निया (California) – अमरिका के सबसे ज्यादा लोकसंख्या (३.९ करोड) वाले राज्य के ५५ निर्वाचक हैं तो वायोमिंग (Wyoming) – सबसे कम लोकसंख्या (अंदाज से ६ लाख) वाले राज्य के ३ निर्वाचक हैं.

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जो पक्ष कॅलिफोर्निया जितेगा उसे ५५ निर्वाचक मिलेंगे. संपूर्ण अमरिका में ५० राज्यों के मिलकर ऐसे ५३८ निर्वाचक हैं और जिस पक्ष को कम से कम २७० निर्वाचक मिलते है वह पक्ष जितेगा और उनका उमीदवार अमरिका का राष्ट्राध्यक्ष बनेगा.
फरक : सांसद (लोकसभा) और निर्वाचक (Elector)

भारत की संसदीय पद्धती में सांसद प्रधानमंत्री को चुनते हैं और संसद में कायदे भी बनाते हैं. सांसद ५ वर्षों के लिए चुने जाते हैं. इसके उलटा अमरिका में निर्वाचकों का उपयोग केवल अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष के चुनाव तक ही सीमित रहता है. निर्वाचक कायदा नही बना सकते.

अमरिका में कायदा बनानेवाले मंडल को काँग्रेस कहते हैं – जैसे भारत में उसे संसद कहा जाता है.

अमेरिका के काँग्रेस में House of Representative (अपनी लोकसभा) और Senate (अपनी राज्यसभा) ऐसी सभांए होती हैं जो कायदे बनाती हैं. House of Representative (लोकसभा) और Senate (राज्यसभा) के स्वतंत्र चुनाव होते हैं जिनका अमेरिकन राष्ट्राध्यक्ष के चुनाव से कुछ भी संबंध नही होता.
अमरिका में राज्य का इतना महत्व क्यों?

भारत में प्रधानमंत्री का चुनाव होते वक्त मतदातासंघ यह मूलभूत घटक है, तो अमरिका में राष्ट्राध्यक्ष के चुनाव में राज्य एक मूलभूत घटक है. यह सबसे महत्वपूर्ण फर्क है भारत और अमरिका में. अमेरिका में प्रत्येक राज्य की खुदकी राज्यघटना है. भारत में काश्मीर के अलावा सभी राज्यों को एक ही राज्यघटना लागू होती है.

अमेरिका का राज्य – छोटा हो अथवा बडा – उसे महत्व है. क्योंकि अमेरिका में राज्य (States) पहले से हि अस्तित्व में थी, वे केवल इकठ्ठा हुई और उन्होंने अमेरिका बनाया. इसीलिए उसे “United States” of America कहते हैं.

मात्र भारत के स्वातंत्र्य के समय में विभिन्न ५५० से भी ज्यादा “शाही राज्य”, संस्थान विलीन करके नया भारत बना और फिर नए राज्य बनाए गए.

टीप:
१. समझना आसान हो इसीलिए अमरिका में ५० राज्य ऐसा लिखा है. परन्तु वास्तव में ५० राज्य और District of Columbia है.

२. ५३८ निर्वाचक यह आकडा ४३५ House of Representative (लोकसभा), १०० Senate (राज्यसभा) और ३ District of Columbia इनकी राशि है

३. मैन (Maine) और नेब्रास्का (Nebraska) यह २ राज्य के अलावा बाकी सारे राज्य ‘जितनेवाला सब ले जाएगा’ (Winner Takes All) पद्धती से निर्वाचक (Electors) बांटते हैं. मैन (Maine) और नेब्रास्का (Nebraska) में उमीदवार को मिले हुए मतों के प्रमाण में निर्वाचक बांटते हैं.

४. ‘जितनेवाला सब ले जाएगा’ (Winner Takes All) पद्धती के कारण हि अमरिका में केवल दो पक्ष बडे हो गए हैं और तिसरे पक्ष को निर्वाचक (Electors) पाने में बडी कठीनाई निर्माण हुई है. ‘‘जितनेवाला सब ले जाएगा’ (Winner Takes All) और निर्वाचक मंडल (Electoral College) के कारण अमरिका में अपने आप हि द्विपक्षीय राज्यव्यवस्था निर्माण हुई है.

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