जब भक्त हनुमान ने पहाड़ों पर अपने नाखूनों से लिखा रामायण फेंक दिया समुंद्र में

वैसे तो भगवान श्री राम के संपूर्ण जीवन पर आधारित कई बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने ज्ञान और अनुभव के अनुसार रामायण की रचना की. जिसमे आज मुख्य रूप रुप से तुलसीदास, महर्षि वाल्मीकि समेत कईयों ने अपने रचना की. मगर बहुत कम लोग होंगे जो ये जानते होंगे कि भगवान श्री राम के परमप्रिय भक्त हनुमान ने भी रामायण की रचना की थी. जी हाँ शास्त्रों के अनुसार, सबसे पहले रामभक्त हनुमान ने ही रामायण की रचना की थी. लेकिन उन्होंने अपनी लिखी रामायण को अपने हाथों से ही समुद्र में फेंक दिया था. उनके ऐसा करने के पीछे क्या कारण था यहां जानते हैं…

अनेक रामायण अस्तित्व

रामायण संस्कृत कई भाषाओँ में रचा एक अनुपम महाकाव्य है. इसके 24 हजार श्लोक हैं. यह हिन्दू स्मृति का वह अंग हैं जिसके माध्यम से रघुवंश के राजा राम की गाथा कही गयी. रामायण के सात अध्याय हैं जो काण्ड के नाम से जाने जाते हैं. सभी में भगवान श्रीराम की लीला का वर्णन करते हुए कई भाषाओं रामायण लिखी और अनुवादित की गई हैं. जो प्रभु श्रीराम के बारे में जितना जानता था उसने उसी अनुसार रामायण की रचना की. हममे से अधिकतर लोग वाल्मीकि रामायण के बारे में ही जानते हैं. लेकिन वाल्मीकि जी तो अयोध्यापुरी में रहते थे, ऐसे में दंडकारण्य में रामजी के साथ क्या-क्या घटा यह दंडकारण्य के ऋषि ही जानते थे. इस तरह अनेक रामायण अस्तित्व में आईं. सभी रामायणों में वाल्मीकि रामायण को मान्यता मिली क्योंकि वह महान ऋषि थे और उन्हें खुद भगवान हनुमान ने वरीयता दी थी.

भक्त हनुमान अपने नाखूनों से पत्थरों पर लिखा रामायण 

शास्त्रों के अनुसार, भक्त शिरोमणि हनुमान द्वारा लिखी गई रामायण को हनुमद रामायण के नाम से जाना जाता है. हनुमानजी ने इस रामायण की रचना तब की जब रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद भगवान राम अयोध्या पर राज करने लगे थे. हनुमान जी प्रभु श्री राम की आज्ञा पाकर हिमालय पर चले गए थे. वहां शिव आराधना के दौरान वह हर दिन रामायण की कथा अपने नाखूनों से पत्थर की शिला पर लिखते थे. एक दिन हनुमानजी यह शिला उठाकर कैलाश पर्वत पर ले जाते हैं और भगवान शिव को दिखाते हैं.

हनुमानजी ने फेंक दिया समंदर में अपना लिखा रामायण 

कुछ समय बाद वाल्मीकि जी भी अपनी रामायण लेकर शिव के समक्ष जाते हैं. ऐसे में ऋषिवर देखते हैं कि वहां पहले से शिला पर रामायण लिखी हुई है, जो स्वयं रामभक्त हनुमान ने लिखी. यह देख वह निराश होकर लौटने लगते हैं. उन्हें निराश होकर जाता देख हनुमानजी उनसे इसका कारण पूछते हैं.

तब ऋषि वाल्मीकि कहते हैं, भगवन बहुत तपस्या के बाद मैंने यह रामायण लिखी थी लेकिन आपकी रामायण के आगे मेरी लिखी रामायण तो कुछ भी नहीं. यह सुनकर हनुमानजी को बहुत कष्ट हुआ. तब उन्होंने एक कंधे पर अपनी रामायण लिखी शिला को उठाया और दूसरे कंधे पर ऋषि वाल्मीकि को बैठाकर समुद्र में ले गए. वहां हनुमानजी ने ऋषि वाल्मीकि के सामने ही अपनी रामायण लिखी शिला को श्रीराम को समर्पित करते हुए समुद्र में फेंक दिया. बस इसीलिए हनुमद रामायण उपलब्ध नहीं है.

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