कमला देवी चटोपाध्याय ने समाज के विरोध में विधवा विवाह और गैर-जाति विवाह करके भी समाज को दिया बहुत कुछ

समाज सेवा के लिए वर्षा 1955 में पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित कमलादेवी चट्टोपाध्याय को उनके 115वें जन्मदिन पर गूगल ने डूडल बनाकर याद किया है. भारतीय समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी कमलादेवी चट्टोपाध्याय का जन्म 3 अप्रैल, 1903 को हुआ था. डूडल में कमलादेवी चट्टोपाध्याय के किये गये कार्यों की झलक भी साफ मिल जाती है.

बाल विवाह और विधवा विवाह का सामना 

कमलादेवी चट्टोपाध्याय का जन्म मंगलोर (कर्नाटक) में हुआ था. इनके पिता मंगलोर के जिलाधिकारी थे. कमलादेवी जब सिर्फ सात साल की ही थीं, तब उनके पिता का निधन हो गया था. कमलादेवी की 14 साल की उम्र में ही शादी कर दी गयी थी, लेकिन दो साल बाद ही उनके पति कृष्ण राव की मौत हो गयी.

चेन्नई के क्वीन मेरीज कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात सरोजिनी नायडू की छोटी बहन से हुई और उन्होंने उनकी मुलाकात अपने भाई हरेंद्र नाथ चट्टोपाध्याय से करायी. इस तरह उनकी दोस्ती हुई और फिर वे विवाह बंधन में बंध गये. विधवा विवाह और जाति-बिरादरी से अलग विवाह करने की वजह से वे आलोचना की शिकार भी हुईं, लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की.

आज के बुनकरों एवं शिल्पियों ‘कमलादेवी चट्टोपाध्याय राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा 

कमलादेवी ने आजादी के बाद भारतीय हथकरघा और रंगमंग में नयी जान फूंकने का काम किया था. आज भारत में कला-प्रदर्शनी से जुड़े कई संस्थान कमलादेवी के विजन का ही नतीजा हैं. इसमें नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, संगीत नाटक अकादमी, सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज इम्पोरियम और क्राफ्ट काउंसिल ऑफ इंडिया शामिल हैं. स्मृति ईरानी द्वारा मार्च 2017 में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला बुनकरों एवं शिल्पियों के लिए ‘कमलादेवी चट्टोपाध्याय राष्ट्रीय पुरस्कार’ शुरू करने की घोषणा भी की गयी है.

कमलादेवी का फिल्मों से भी रहा नाता 

कमलादेवी ने फिल्मों में भी हाथ आजमाया था. वे दो साइलेंट (मूक) फिल्मों में नजर आयी थीं. इसमें से एक कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री की पहली साइलेंट फिल्म थी. इसका नाम ‘मृच्छकटिका (1931)’ था, लेकिन लंबे समय बाद वे एक बार फिल्मों में नजर आयीं. वे ‘तानसेन’ फिल्म में केएल सहगल और खुर्शीद के साथ नजर आयीं. उसके बाद कमलादेवी ने ‘शंकर पार्वती (1943)’ और ‘धन्ना भगत (1945)’ जैसी फिल्में भी कीं.

कमलादेवी पति हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय के साथ लंदन चली गयी थीं, लेकिन जब 1923 में उन्हें गांधीजी के असहयोग आंदोलन के बारे में पता चला, तो वे भारत आ गयीं और आजादी के आंदोलन में कूद गयीं. उन्होंने गांधीजी के नमक सत्याग्रह में भी हिस्सा लिया था. हालांकि, हरेंद्रनाथ से उनका तलाक हो गया था.

आजादी के बाद देश का विभाजन हो गया था और शरणार्थियों को बसाने के लिए जगह की तलाश थी. उस समय कमलादेवी ने गांधीजी से अनुमति लेकर टाउनशिप बसाने का जिम्मा लिया और बापू ने कहा था कि तुम्हें सरकार की कोई मदद नहीं लेनी होगी. इस तरह फरीदाबाद सामने आया, जहां 50,000 शरणार्थियों को रहने की जगह मिली. इसे सहकारिता की संकल्पना पर स्थापित किया गया था.

समाज हित और देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाली कमला देवी चटोपाध्याय को सन 1966 रेमन मैगसेसे पुरस्कार,
सन 1955 पद्म भूषण और सन 1987 पद्म विभूषण पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है.

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