जानिए उन वजहों को जो नया साल की जगह अप्रैल फुल के तौर पर मनाया जाने लगा

जैसा की आप लोगो को पता ही है की हर साल 1 अप्रैल को बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी एक दूसरे को बेवकूफ बनाने में लग जाते हैं. एक अप्रैल, इस दिन को पूरे विश्व में अप्रैल फूल-डे के तौर पर मनाया जाता है. इस दिन लोग एक-दूसरे को बेवकूफ बनाते हैं. फनी प्रैंक्स खेलते हैं और हल्के-फुल्क जोस्क से अपनों के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं. लेकिन बहुत ही कम लोगों को मालूम है कि आखिर यह दिन क्यों मनाया जाने लगा और एक अप्रैल तारीख से आखिर इसका नाता क्या है ? यहां आपको बता रहे हैं कि कैसे यह दिन अप्रैल फूल दिवस के रुप में मनाया जाने लगा. और क्या है इसकी वास्तविकता ?

फ्रांस से हुई थी अप्रैल फूल डे की शुरुआत

बताया जाता है अप्रैल फूल डे की शुरुआत फ्रांस से हुई थी. 1508 में एक फ्रांसीसी कवि ने एक प्वाइजन डी एवरिल (अप्रैल फूल, जिसका शाब्दिक अर्थ है “अप्रैल फिश”) का सन्दर्भ दिया. शासक पॉप ग्रेगरी 13 ने वर्ष 1582 में हर यूरोपियन देश को जूलियन कैलेंडर छोड़कर ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार चलने को आदेश दिया था.


गौर करने वाली बात ये है की ग्रेगोरियन कैलेंडर में नया साल 1 अप्रैल से नहीं बल्कि 1 जनवरी से शुरू होता है. कई लोगों ने इसे मानने से इनकार कर दिया और अपना नया साल 1 अप्रैल को ही मानते थे. इस वजह से जो लोग जनवरी में नया साल मनाते थे वो अप्रैल में नया साल मनाने वालों को अप्रैल फूल कहने लगे.

लोग मजाक करके एक-दूसरे को बेवकूफ बनाने लगे और धीरे-धीरे कर के ये चलन पूरे यूरोप में फैल गई. बता दें कि पूरी दुनिया इस दिन को मनाती है. जापान और जर्मनी में पूरे दिन लोग मजाक करते है तो वहीं स्कॉटलैंड में इसे लगतार दो दिनों तक मनाया जाता है. फ्रांस में इसे फिश डे कहा जाता है, इस दिन बच्चे कागज की बनी मछली एक दूसरे के पीठ पर चिपका कर अप्रैल के इस दिन को मनाते हैं.

प्रचलित हैं अप्रैल फूल से जुड़ी कई कहानियां 

लोगों की मान्यताएं है कि अप्रैल फूल से जुड़ी कई कहानियां प्रचलित हैं. इतिहास पर नजर डाली जाए तो 1 अप्रैल के दिन कई फनी घटनाएं हुई. जिसके चलते इस दिन को अप्रैल फूल-डे के तौर पर मनाया जाने लगा. जैसे 1539 में फ्लेमिश कवि ‘डे डेने’ ने एक अमीर आदमी के बारे में लिखा जिसने 1 अप्रैल को अपने नौकरों को मूर्खतापूर्ण कार्यों के लिए बाहर भेजा.

एक अप्रैल 1698 को कई लोगों को “शेर की धुलाई देखने” के लिए धोखे से टावर ऑफ लंदन में ले जाया गया. लेखक कैंटरबरी टेल्स (1392) ने अपनी एक कहानी ‘नन की प्रीस्ट की कहानी’ में 30 मार्च और 2 दिन लिखा, जो प्रिंटिंग में गलती के चलते 32 मार्च हो गई, जो असल में एक  अप्रैल का दिन था. इस कहानी में एक घमंडी मुर्गे को एक चालाक लोमड़ी ने बेवकूफ बनाया था.

इस गलती के बाद कहा जाने लगा कि लोमड़ी ने एक अप्रैल को मुर्गे को बेवकूफ बनाया. वहीं, अंग्रेजी साहित्य के महान लेखक ज्योफ्री चौसर का ‘कैंटरबरी टेल्स (1392)’ ऐसा पहला ग्रंथ है जहां एक अप्रैल और बेवकूफी के बीच संबंध जिक्र किया गया था.

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