जानिए फेक न्यूज के सबसे बड़े माध्यम और किस देश में है कड़ा कानून

फेक न्यूज़ यानि फर्जी खबरों को लेकर इन दिनों खूब घमासान मचा रहा. हालही में स्मृति ईरानी के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फर्जी खबर फैलाने को लेकर गाइडलाइन जारी की थी. जिसपर विपक्षीय पार्टियों के नेताओं ने सवाल उठाए थे. मगर 24 घंटों बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा है कि इससे जुड़े मुद्दों पर प्रेस काउंसिल और न्यूज एंड ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) जैसी संस्थाएं ही विचार करें. जिसके बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का नोटिफिकेशन रद्द कर दिया.

क्या है फेक न्यूज

अगर आप मीडिया इंडस्ट्री से हैं या नजदीक से जुड़े हैं तो आप जानते ही होंगे कि फेक न्यूज क्या है. यह एक तरह की पीत पत्रकारिता (येलो जर्नलिज्म) है. इसके तहत किसी के पक्ष में प्रचार करना व झूठी खबर फैलाने जैसे कृत्य आते हैं. किसी व्यक्ति या संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाने या लोगों को उसके खिलाफ झूठी खबर के जरिए भड़काने को कोशिश फेक न्यूज है.

सनसनीखेज और झूठी खबरों, बनावटी हेडलाइन के जरिए अपनी रीडरशिप और ऑनलाइन शेयरिंग बढ़ाकर क्लिक रेवेन्यू बढ़ाना भी फेक न्यूज की श्रेणी में आते हैं. फेक न्यूज किसी भी सटायर (व्यंग) या पैरोडी से अलग है. क्योंकि इनका मकसद अपने पाठकों का मनोरंजन करना होता है, जबकि फेक न्यूज का मकसद पाठक को बरगलाने का होता है.

फेक न्यूज़ के प्रभाव

सोशल मीडिया पर ऐसी कई अफवाहें और गलत सूचनाएं पोस्ट और शेयर की जाती है कि इसका प्रभाव काफी बुरा होता है. जिसका सबसे बड़ा उदाहरण हालही में हुआ दलितों का आंदोलन जो गलत जानकारी और फेक न्यूज़ के चलते हिंसक और देश विरोधी हो गया.

24 घंटों में रद्द कर दिया गया सरकार का दिशा निर्देश 

भारत में फेक न्यूज से निपटने के लिए सरकार ने २ अप्रैल की  रात कड़े दिशानिर्देश जारी किए थे, जिन्हें कड़े विरोध के बाद 3 अप्रैल को रद्द कर दिया गया. देश में फेक न्यूज को रोकने के लिए कोई कानून नहीं है. हालांकि इंडियन ब्रॉडकास्टर्स फाउंडेशन और बॉडकास्टिंग कंटेंट कम्प्लेंट काउंसिल जैसे संस्थानों में फेक न्यूज के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई जा सकती है. एशिया के विभिन्न देशों में फेक न्यूज से निपटने के लिए वहां की सरकारों ने कई प्रावधान लागू किए हैं.

विदेश में फेक न्यूज़ के खिलाफ कानूनी प्रावधान

भारत में फेक न्यूज़ के खिलाफ जारी और रद्द होने से एक दिन पहले ही मलेशिया ने फेक न्यूज को लेकर एक कड़ा बिल पास किया है. इसमें झूठी खबरों के प्रकाशन पर छह साल की सजा का प्रावधान किया गया है. पहले इसमें दस साल की सजा की व्यवस्था की गई थी लेकिन विरोध के चलते इसे घटाकर छह साल कर दिया गया. फेक न्यूज को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मीडिया पर निशाना साधते रहे हैं. हाल के दिनों में भारत में भी सोशल मीडिया पर फेक न्यूज का चलन बढ़ा है.

फिलीपींस के राष्ट्रपति रॉड्रिगो दुतेर्ते ने साफ तौर पर यहां की न्यूज साइट रैपलर को झूठा करार किया है और आधिकारिक आयोजनों की रिपोर्टिंग करने से रोक दिया है. यहां नया कानून बनाया जा रहा है जिसमें गलत खबरें फैलाने पर जुर्माना लगाने के साथ 20 वर्ष तक जेल की सजा का प्रावधान होगा.

थाइलैंड में साइबर सिक्योरिटी कानून के तहत झूठी खबर फैलाने वाले व्यक्ति या मीडिया संस्थानों को सात वर्ष तक की जेल हो सकती है. यहां की सेना ऐसे कानूनों का सख्ती से पालन करती है जिससे शाही परिवार का कोई अपमान न कर सके.

भारत में अभी तक नहीं है कोई कानून 

फिलहाल भारत में फेक न्यूज़ के खिलाफ अभीतक कोई कड़ा कानून नहीं है. मगर किसी व्यक्ति विशेष को किसी खबर के खिलाफ कोई आपत्ति हो तो उसके लिए न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन, ब्रॉडकास्टिंग कंटेंट कंप्लेंट काउंसिल और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में शिकायत कर सकता है.

न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन निजी टेलीविजन समाचारों और हालिया घटनाओं के प्रसारण पर नजर रखता है. यहां 24 घंटे दिन रात चलने वाले चैनलों की सामग्री के बारे में शिकायत की जा सकती है.

ब्रॉडकास्टिंग कंटेंट कंप्लेंट काउंसिल टीवी पर आपत्तिजनक प्रसारण या किसी झूठी खबर के बारे में यहां शिकायत दर्ज कराई जा सकती है.

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया 1978 के प्रेस काउंसिल एक्ट के तहत यह संस्था किसी समाचार पत्र, किसी समाचार एजेंसी, संपादक, पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है.

प्रिंट मीडिया के खिलाफ शिकायत प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) के पास भेजी जाती. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के खिलाफ शिकायत न्यूज एंड ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) को भेजी जाती. दोनों एजेंसियां 15 दिन में जांच करके न्यूज के फेक या सही होने का फैसला करती. जांच के दौरान संबंधित पत्रकार की मान्यता निलंबित रहती.

फेक न्यूज़ के सबसे बड़े माध्यम सोशल मीडिया 

मीडिया खबरों की माने तो फेक न्यूज़ का सबसे बड़ा माध्यम सोशल मीडिया को माना जा रहा है. जिसमे मुख्य रूप से फेसबुक और व्हाट्सअप को अव्वल माना जा रहा. हालांकि मंत्रालय ने जो दिशा-निर्देश जारी किए थे उसमें डिजिटल मीडिया की बात नहीं कही गई थी. लेकिन इससे पहले सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी कह चुकी हैं कि सरकार डिजिटल मीडिया के लिए भी दिशा-निर्देश जारी करेगी. फेक न्यूज पर रोकथाम लगाने की कोशिशें वैश्विक स्तर पर जारी हैं. खासतौर पर डिजिटल मीडिया में फेक न्यूज को लेकर तमाम सरकारें अलर्ट हैं. माना जाता है कि 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रूस ने फेसबुक पर फेक न्यूज का इस्तेमाल कर लोगों का मत बदलने की कोशिश की थी. ऐसा ही कुछ भारत में भी होने का खतरा है. जो आने वाले दिनों में कई राज्यों व केंद्र सरकार के लिए होने वाले चुनावों पर असर डाल सकता है.

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