मैसूर का शेर जिसने रॉकेट का अविष्कार कर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए !

टीपू सुल्तान एक जांबाज़ योद्धा के नाम से जाना जाता है. टीपू सुल्तान ने कई बार अंग्रेजों को धूल चटाई! वह बेहद ही निपुड योद्धा था. १५ साल की उम्र से ही टीपू सुल्तान ने अपने पिता हैदर अली के साथ जंग में जाने की शुरुआत कर दी थी. जब वह महज १८ साल के थे तभी उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ जंग में अंग्रेजों को धूल चटा दी थी ..

आईये ऐसे ही कुछ पहलुओं पर नज़र डालते हैं जो की इस सुल्तान से जुड़े हुए है. टीपू सुल्तान एक सिपाही का बेटा था. उसने जंग के गुण वही से सीखे थे. वो गोर्रिल्ला रण नीति से जंग लड़ने में माहिर हुआ करते थे. टीपू का जन्म २० नवंबर १७५० में कर्नाटक के देव्नाहली में हुआ था. टीपू का पूरा नाम सुल्तान फ़तेह अली खान साहेब था. पूरी ज़िन्दगी उन्होंने अपने दम पर राज्य किया.

tipu roket kuchhnaya

टीपू को रॉकेट का पहला अविष्कारक माना जाता है. आज भी उसके बनाये हुए रॉकेट ब्रिटिश म्यूजियम में देखे जा सकते है. जो की अंग्रेज भारत छोड़ते समय अपने साथ ले गये. महान वैज्ञानिक ए पी जे अब्दुल कलाम को भी पहला मिसाइल मैन कहा था.

१७७९ में अंग्रेजों ने फ़्रांसिसी के इलाके माहे के बंदरगाह पर कब्ज़ा कर लिया था जो की उस समय टीपू के इलाके में आता था. तब टीपू के पिता हैदर अली ने अंग्रेजो को खदेड़ने के लिए कर्नाटक पर हमला किया … जिससे की अंग्रेजो को मद्रास से बाहर किया जा सके…जिसमे की ३०० अंग्रेजों को जीवित बंदी बना लिया और करीब ३८०० सैनिकों बहुत नुकसान पंहुचा.

इसकी ख़ुशी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है ,कि जिस तरह से टीपू ने अंग्रेजों की हार के चित्र अपने ग्रीष्मकाल किले पर बनवाये थे. लेकिन इस आक्रमण के बाद से टीपू को अपने क्षेत्र की चिंता सताने लगी थी. २२ दिसम्बर १९८२ को हैदर अली की मौत के बाद टीपू का राज्य अभिषेक हुआ और एक शासक के रूप में उनका सफ़र शुरू हुआ.

Rocket_warfare kuchhnaya
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अंग्रेजों के साथ उनका युद्ध यही समाप्त नहीं हुआ. समय-समय पर उनको अक्सर अंग्रेजों का सामना करना पड़ा. ऐसा ही एक किस्सा तब हुआ जब उनकी जंग त्रावणकोर के धर्मराज से हुई. त्रावणकोर को अंग्रेजों का मित्र माना जाता था. टीपू से विवाद के बाद वहां के राजा ने अंग्रेजों से मदद मांगी और उसपर हमला किया. इस जंग में १७९० में अंग्रेजों ने कोयंबटूर के कई इलाकों पर कब्जा कर लिया. टीपू ने इस जंग में कई इलाके जीते ; लेकिन कोयंबटूर को दोबारा हासिल न कर सके.

सन १७९१ में एक बार फिर अंग्रेजों ने टीपू को धमकी दी की वो बैंगलोर में हमला कर उसपर कब्ज़ा कर लेंगे, लेकिन इस बार चतुराई दिखाते हुए टीपू ने स्थनीय लोगों के साथ समझौता कर लिया और अंग्रेजों का हुक्का पानी बंद करवा दिया. जिसके चलते अंग्रेजों को बंगलौर छोड़कर भागना पड़ा. जिसके चलते टीपू को एक बार फिर कोयंबटूर वापस मिल सका .

सन १७९९ में अंग्रेजों ने अपनी सेना मैसूर भेजी और श्रीरंगपतन को दोनों तरफ से घेर लिया. इस बार अंग्रेजों की सेना में २६ हजार सैनिक थे जिनमे से गोरे महज चार हजार और बाकी सब भारतीय थे. साथ ही १६ हजार घुड़सवार भी थे. लगभग ५० हजार से भी ज्यादा सैनिक मौजूद थे वही टीपू के पास महज़ ३० हजार सैनिक थे. अंग्रेजों ने टीपू को चारों  तरफ से घेर लिया और हमला बोल दिया.

टीपू के एक फ़्रांसिसी सलाहकार ने उनको गुप्त रास्ते से छुपकर निकलने की भी सलाह दी जिससे की वो अगले दिन फिर से जंग का सामना कर सके लेकिन इस जांबाज़ योद्धा ने मना कर दिया और कहा – ”शेर की एक दिन की ज़िन्दगी गीदड़ के १००० साल की ज़िन्दगी से बेहतर है” इसके बाद टीपू सुल्तान अपनी आखिरी सांस तक लड़े. टीपू की ४ मई को अपनी राजधानी को बचाते हुए मौत हो गयी. तब से उनको मैसूर के शेर तौर के पर भी जाना जाता है.

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