एक ऐसी जगह जहां राक्षसों के बनाये शिवलिंग ही शिवलिंग

वैसे तो भारत में कई पवित्र नदियां मौजूद है. हर किसी के उद्गम के पीछे कोई न कोईं कहानी जुडी है. इन्ही में से एक नर्मदा नदी है. जिसे ब्रह्माण्ड की सबसे पुरानी नदी का दर्जा प्राप्त है. यह चिरकाल से यहां अविरल बह रही है. जिसका उल्लेख पुराणों में भी है. इसके बारे में कहा जाता है कि जब तक दुनिया में जीवन रहेगा यह इसी तरह प्रवाहित होती रहेगी. इसके हर घाट, तट पर एक नया रहस्य, इतिहास और कहानियां जुड़ी हुई हैं. कोई इसे जगतजननी कहता है तो किसी ने इसे शिव पुत्री के रूप में स्वीकार किया है. खैर, लोग जो भी इसे मानें परंतु आस्था सबकी एक जैसी है. माता के रूप में इसे सभी ने स्वीकार किया है. संस्कारधानी जबलपुर में मां नर्मदा की विशेष कृपा है. यहां के लोग माता का नाम लिए बिना दिन की शुरुआत ही नहीं करते हैं. यहां तो सुबह शाम मां नर्मदा का नाम लिया जाता है. नर्मदा जन्मोत्सव 2018, इस बार 24 जनवरी को मनाया जाएगा. इस मौके पर हम आपके लिए लाया है रहस्य, रोमांच और शास्त्रों से जुड़ी कुछ रोचक लेकिन सत्य से जुड़ी कहानियां..

राक्षस बाणासुर के स्थापित शिवलिंग आज भी है मौजूद 

shiva kuchhnaya

स्थानीय लोगों के अनुसार दैत्यों के सबसे ज्यादा प्रिय भगवान भोलेनाथ रहे हैं. वे उनकी तपस्या कर वरदान प्राप्त करते थे. एक ऐसा ही राक्षस बाणासुर हुआ करता था. जिसने सृष्टि को जीतने के लिए देवाधिदेव महादेव की घोर तपस्या की. उसने मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर से लगभग 22 किलोमीटर दूरी पर स्थित भेड़ाघाट के पास मां नर्मदा तट पर बैठकर सहस्त्र पार्थिव शिवलिंग बनाए और उनका अभिषेक पूजन करने के बाद नर्मदा में विसर्जन किया. जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने उसे मनचाहा वरदान दिया. जिस स्थान पर बाणासुर ने तपस्या की थी, वहां आज भी शिवलिंग मौजूद हैं. हजारों सालों से वे शिवलिंग जैसे के तैसे पड़े हुए हैं. इसे आज बाण कुंड के नाम से भी जाना जाता है. यहां का हर पत्थर गोल है,ये स्वयं प्रतिष्ठित शिवलिंग हैं, इन्हें घर पर या देवस्थान पर रखकर सीधे पूजन किया जा सकता है. बताया जाता है बाणासुर ने सवा लाख पार्थिव शिवलिंग निर्माण किया व उनका रुद्राभिषेक कर कुण्ड में विसर्जित करता रहा. इसके बाद से इस कुण्ड का हर पत्थर शिवलिंग जैसा गोल होने लगा, जिससे बाणासुर के नाम से इस कुंड को पहचाना जाने लगा.

छिपा है नर्मदा हजारों रहस्य

shiva kuchhnaya

नर्मदा अपने उद्गम अमरकंटक से लेकर भरूच में समंदर से मिलन तक हजारों रहस्य छिपाए हुए हैं. जिनमें अधिकतर ऐसे हैं जो प्रत्यक्ष प्रमाणित हैं. इनका शास्त्रों में उल्लेख भी मिलता है. संस्कारधानी जबलपुर में मां रेवा का एक ऐसा ही कुण्ड मौजूद है, जहां मां नर्मदा अपनी पावन धाराओं से स्वयं पत्थरों को भगवान शिव में परिवर्तित कर रही है.

शिव-पार्वती की ऐसी प्रतिमा जो पूरे भारत में कही नहीं

Calcutary Temple kluchhnaya
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मेकलसुता का यह कुण्ड सदियों से आस्था और विश्वास का केन्द्र बना हुआ है. ऐसा माना जाता है कि इस कुण्ड के शिवलिंग को बिना प्राण प्रतिष्ठा किए सीधे पूजा जा सकता है. इसी कुण्ड के पास कल्चुरीकालीन मंदिर में विद्यमान भगवान शिव और पार्वती की अनोखी प्रतिमा स्थापित है, जो संपूर्ण भारत में कहीं और देखने नहीं मिलती. शिव विवाह प्रसंग की यह प्रतिमा अपने आप में अनूठी है.

ऋषि के कहने पर पार्वती के साथ भोलेनाथ ने नर्मदा में ली समाधी 

Agastya kuchhnaya

पुरात्व विशेषज्ञों की मने तो 8वीं शताब्दी में कल्चुरी काल के राजा नृसिंहदेव की माता अल्लहड़ देवी ने प्रजा की सुख-शांति के लिए शिव पार्वती मंदिर का निर्माण कराया था. इस स्थल पर सुपर्ण ऋषि ने भगवान शिव की आराधना की थी. भगवान शिव, माता पार्वती ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए. ऋषि ने उन्हें अनुष्ठान तक इसी स्थान पर रुकने के लिए कहा और नर्मदा में जल समाधि ले ली. तब से भगवान भोलेनाथ  माता पार्वती के साथ यहीं के होकर रह गए. इन्हें कल्याणसुंदरम भी कहा जाता है.  मंदिर में विद्यमान शिव विवाह के अवसर की है और यह संपूर्ण भारत में इकलौती प्रतिमा है. इनकी बारात में आई योगिनी बाहर प्रांगण में विराजमान हैं. सावन सोमवार, कार्तिक पूर्णिमा, शिवरात्रि , बसंत पंचमी, पुरुषोड्डाम माह में भक्तों की भीड़ उमड़ती है.

साभार- पत्रिका 

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