गुजरात की एक ऐसी साड़ी जो बनती है महीनों में बिकती है लाखों में

आपने देशभर के तमाम नामी गिरामी साड़ियों के बारे में सुना होगा. जिसमे सबसे ज्यादा बनारसी साड़ी काफी महंगी और मशहूर मानी जाती है. आज हम आपको ऐसी साड़ी के बारे में जानकारी देंगे जो पूरी दुनिया में एक जगह ही बनती जिसकी कीमत होती है लाखों रुपये.

जिसका नाम है पाटन पटोला साड़ी नाम सुनकर थोड़ा अजीब जरूर लगे लेकिन यह साड़ी अपने आप में बेहद खास है. बनावट से लेकर कीमत और एक साड़ी में लगने वाले समय तक, इस साड़ी के बिजनेस की हर बात बाकी बिजनेस से काफी अलग है.

पूरी तरह हाथ से बनने वाली यह साड़ी तकरीबन 4 से 6 माह में बनकर तैयारी होती है और इसकी कीमत 4 लाख रुपए तक है. सबसे खास बात यह है प्‍योर सिल्‍क से बनने वाली ओरिजनल पटोला साड़ी पूरी दुनिया में सिर्फ पाटन (गुजरात) में ही बनती है।

900 साल पुरानी इस कला के खरीदार देश ही नहीं विदेश में भी काफी ज्‍यादा हैं. इसके अलावा पाटन पटोला साड़ी की कोई इंडस्‍ट्री नहीं है. यह बिजनेस केवल ऑर्डर पर ही चलता है और पूरे देश में केवल 3 परिवार ही हैं, जो इस बिजनेस से जुड़े हैं. ये तीनों परिवार पाटन से ही हैं.

ऑर्डर देने के बाद ऑर्डर पाने के लिए कम से कम 2 से 3 साल का इंतजार करना पड़ता है. इसकी वजह है कि एक पटोला साड़ी को बनाने में कम से कम चार आदमी और 4 से 6 महीने लगते हैं और एक लूम से हर साल एवरेज 4 से 5 पटोला साड़ी ही बन पाती हैं.

पटोला साड़ी की परंपरा है सालों पुरानी

पाटन पटोला साड़ी का इतिहास 900 साल पुराना है. कहा जाता है कि 12वीं शताब्दी में सोलंकी वंश के राजा कुमरपाल ने महाराष्ट्र के जलना से बाहर बसे 700 पटोला वीवर्स को पाटन में बसने के लिए बुलाया और इस तरह पाटन पटोला की परंपरा शुरू हुई. राजा अक्‍सर विशेष अवसरों पर पटोला सिल्‍क का पट्टा ही पहनते थे.

पाटन में केवल तीन ऐसे परिवार हैं, जो ओरिजनल पाटन पटोला साड़ी के कारोबार को कर रहे हैं और इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. इस विरासत को जीआई टैग भी मिला हुआ है. एक पटोला साड़ी की कीमत कम से कम डेढ लाख रुपए से 4 लाख रुपए तक होती है. पटोला आर्ट इतनी ज्यादा अनमोल है कि 1934 में भी एक पटोला साड़ी की कीमत 100 रुपए थी.

पटोला साड़ी दोनों तरफ से पहनने में होती है उपयोगी

पटोला साड़ी को टाइंग, डाइंग और वीविंग टेक्नीक से बनाया जाता है. पटोला साड़ी की सबसे बड़ी खासियत है कि इसे दोनों तरफ से पहना जा सकता है. इसे ‘डबल इकत’ आर्ट कहते हैं. डबल इकत में धागे को लंबाई और चौड़ाई दोनों तरह से आपस में क्रॉस करते हुए फंसाकर बुनाई की जाती है. डबल इकत को मदर ऑफ ऑल इकत भी कहा जाता है.

इसके चलते साड़ी में ये अंतर करना मुश्किल है कि कौन सी साइड सीधी है और कौन सी उल्टी. इस जटिल बुनाई के चलते ही यह आर्ट अभी भी देश-विदेश में फेमस है और काफी महंगी भी. पटोला साड़ी की दूसरी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका रंग कभी फेड नहीं होता और साड़ी 100 साल तक चलती है.

कई देशों में होता है व्यापार 

पाटन में पटोला बनाने वाली तीन फैमिली में से एक माधवी हैंडीक्राफ्ट्स के ओनर सुनील सोनी के मुताबिक पाटन में 18 लूम हैं, वहीं बाकी की दो फैमिली के 1-1 लूम हैं. यानी कुल 20 लूम हैं. इन 20 लूम से साल में एवरेज 100 साड़ी बन पाती हैं. इस हिसाब से साल में मिनिमम 1.5 करोड़ रुपए की साड़ी बनती हैं, मैक्सिमम कारोबार लगभग 4 करोड़ रुपए का होता है.

पाटन पटोला साड़ी का एक्‍सपोर्ट 13वीं शताब्‍दी से हो रहा है. उस वक्‍त इंडोनेशिया और मलेशिया पटोला के लिए प्रमुख एक्‍सपोर्ट डेस्टिनेशन थे. अभी की बात करें तो सुनील सोनी के मुताबिक, पाटन में विदेश से आने वाले ऑर्डर साल में 50 से 60 रहते हैं. यानी पाटन में बनने वाली पटोला साड़ी में से 40 फीसदी एक्‍सपोर्ट हो जाती है.

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