दो महान हस्तियों की अव्यक्त प्रेम कहानी…

हमारे अन्य लेख पढने के लिये फॉलो करे : फेसबुकट्विटर

===

बॉलीवुड की ‘अधूरी प्रेम’ कहानी की बात जब चलती है तब कई जानी मानी जोड़ियों के नाम आंखों के सामने आ जाते हैं. अमिताभ-रेखा, सलमान खान-ऐश्‍वर्या रॉय, शाहीद कपूर-करीना कपूर और कई ऐसी प्रसिद्ध प्रेम कहानियाँ हैं.

पर एक प्रेम कहानी ऐसी भी है जिसके बारे में शायद बहुत कम लोग जानते है वो प्रेम कहानी है मशहूर गीतकार साहिर लुधियानवी और कवियत्री अमृता प्रीतम की!!

sahir amruta kuchhnaya
indiatimes.com

‘आगे भी जाने ना तू’ ‘ओ मेरी जहरजोफी’
‘तुम अगर साथ देने का वादा करो’

ऐसी कई सुंदर रचनाएं लिखने वाले साहिर की प्रेम कहानी इतनी दर्द भरी होगी किसी को भी इस बात का अंदाज नहीं होगा. वैसे तो अमृता प्रीतम भी एक जानी मानी कवियत्री थी.
उनकी लिखी हुई कविता….

‘खाली कागज भी
साफ दिल जैसा हाता है
जिस पर लिख सकते है
अपनी जान किसी के नाम…’

उनकी शेरो-शायरी भी लाजवाब थी

‘ख्यालों की भीड में सरकता हुआ वक्त
तेरे ख्यालों के सामने थम जाता है.’

दोनों के पास ही शब्दों की ताकत थी. दोनों ही बेहतरीन कलाकार थे. इन दोनों की प्रेम कहानी इकतरफा नहीं थी फिर भी शब्दों में व्यक्त ना होंने के कारण अधूरी रही.

किसके प्यार के साथ क्या यादें जुड़ी होंगी ये नहीं कहा जा सकता. समुद्र किनारे हुई अचानक से मुलाकात, रास्ते पर अचानक नजर आया कोई चेहरा, गिरा हुआ रूमाल, किसी की भूली हुई कोई चीज….

साहिर और अमृता की प्रेम कहानी जुड़ी है चाय के एक ना धुले हुए कप से, आधी सिगरेट से..

इस प्रेम कहानी की चर्चा बॉलीवुड में ना हो ऐसा कैसा हो सकता है. ऐसा सुनने में आया है की, इस प्रेम कहानी पर बनी हुई फ़िल्म हमें जल्द ही बड़े परदे पर देखने को मिलेगी और उस फ़िल्म में साहिर का किरदार इरफान खान निभाएंगे.

१९४४ की प्रेम कहानी है ये.. अमृता और गीतकार साहिर पहली बार लाहौर और दिल्ली के बीच प्रीतनगर गाँव में एक मुशायरा (कवि सम्मेलन) के दौरान मिले थे.

अमृता की सुंदरता की तरह उसके शब्द भी चमकदार थे. दोनों की मुलाकात एक हॉल में हुई थी जहाँ आंखों ही आंखों में वो एक दूसरे को दिल दे बैठे थे. एक सच्चे कलाकार को दूसरा कलाकार ही समझ सकता है.

कार्यक्रम देर से खत्म हुआ और सभी लोग निकलने लगे,दूसरे दिन सभी को अगले कार्यक्रम के लिये लोपोकी इस शहर में जाना था और वहाँ से उन्हें लाहौर आने के लिये बस थी.

परंतु ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था. रात को तेज बारिश हुई और जिस गाँव में उनको जाना था वहाँ के रास्ते धोखादायक थे इसलिए सभी ने चल कर जाना पसंद किया.

sahir amruta kuchhnaya
Samachar Jagat

उस रात की बारिश का बखान करते हुए अमृता ने कहा है की, ‘जब मैं बारिश को देख रही थी तो मुझे लग रहा था की नियति ने मेरे हृदय में प्रेम के बीज अंकुरित किये हैं, और प्यार की बारिश कर उसे बढ़ा रहे हैं”

साथ साथ चलते हुए उन दोनों की परछाई एक दूसरे में मिल गई थी.

इस बारे में अमृता ने कहा है कि, “मैं अपनी पूरी जिंदगी इस शख्स के साथ गुजार पाऊँगी क्या? और अगर इस रिश्ते में परेशानी हुई तो क्या शब्दों से मन बहला पाऊँगी?” इस तरह की कविता उन्होंने साहिर के प्रेम में रंग कर लिखी..

पर उस कविता के पीछे की प्रेरणा को उन्होंने कभी उजागर नहीं किया.

जब वो दोनों पहली बार मिले तब अमृता की शादी हो चुकी थी, ये शादी उनके बचपन में ही प्रीतम सिंग नाम के व्यक्ति से हुई थी, पर उनका वैवाहिक जीवन कभी सुखी नहीं रहा.

सच तो ये है कि, साहिर ने जब पहली बार अमृता को देखा तो अपनी माँ से कहा कि “वो अमृता प्रीतम है, वो आपकी बहू बन सकती थी” अ पीपल्स पोएट के लेखक अक्षय मानवानी ने कहा है की,

साहिर ने स्वीकार किया था कि, अमृता प्रीतम ही एक ऐसी लड़की हैं जो उन्हें किसी भी परिस्थिति में अकेला नहीं छोडेगी.

कई मुशायरों में एक साथ सम्मिलित होने के बाद साहिर और उनकी पहचान हुई और ये पहचान प्यार में बदल गई, पर ये कभी किसी पर जाहिर नहीं होने दी. उनके बीच पत्र व्यवहार शुरू रहा.

sahir kuchhnaya
The Better India

वो लाहौर मे थे और अमृता प्रीतम दिल्ली में. उनके पत्रों से साफ़ पता चलता था कि, वह साहिर के प्यार मे थी उन्होंने इस बात का उल्लेख ‘मेरा शायर’, ‘मेरा महबूब’, ‘मेरा ख़ुदा’और ‘मेरा देवता’ ऐसे लिख कर किया था.

फिर भी उन्होंने कभी वचन नहीं दिया. उन्हें प्रेम बंधन में रहना शायद पसंद ना हो या शादीशुदा होने के कारण उन्हें ये सब उचित ना लगता हो.

वो दोनों एक दूसरे से मिलने की जगह प्रेम पत्र लिखना पसंद करते थे और जब भी मिलते खामोशियों से ही बात करते थे. उनके बीच इतना गहरा प्यार था.

‘अभी ना जाओ छोड़ कर, के दिल अभी भरा नहीं..’ इन शब्दों को गीत का रूप देने वाले जब अपनी प्रेमिका के साथ होते थे तो निशब्द हो जाते थे. या तो पास में एक ऐसी व्यक्ति है जो मन की भाषा पढ़ लेती है इसलिए वह खामोश ही रहते थे.

अमृता ने कहा था की, हम दोनों के बीच दो मुख्य बाधायें थी. एक तो मौन और दूसरी भाषा.. वो उर्दू लिखते थे और अमृता पंजाबी..

‘मैं पल दोपल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी हस्ती है, पल दो पल मेरी जवानी है..’

कितनी ताकत थी उनके शब्दों में..अगर उन्होंने इन्हीं शब्दों से अपने प्यार का इजहार किया होता तो उन्हें मनचाहा हमसफर मिला होता.

sahir kuchhnaya
Aaj Tak

पर अगर या मगर के कारण ही सारी परेशानियाँ होती हैं. अमृता भी एक बहुत ही मशहूर कवियत्री थीं. उन्होंने अपने ‘एक मुलाकात’ ‘खाली जगह’, ‘एक पत्र’, ‘सिगरेट’ इस कविता में अपने दिल की बात कागज पर उतारी है, पर उन्होंने ये सब साहिर से कभी नहीं कहा.

अमृता के ‘रसेदी टिकट’(महसूल मुद्रांक) इस आत्मकथा में उन्होंने साहिर के शान्त स्वभाव का वर्णन किया है. वो कहती है की,

”जब साहिर मुझसे मिलने के लिए लाहोर आया था. तब मुझे ऐसा एहसास हुआ था की, हमारे बीच मौजूद ख़ामोशी ने शायद हमारे पास की कुर्सी पकड़ ली है”

उन्होंने एक और कहानी बतायी है. साहिर सिगरेट जला रहे थे और आधी सिगरेट खत्म होने के बाद उसको बुझाकर फिर नई सिगरेट जला रहे थे और पहले वाली सिगरेट वैसे ही रख रहे थे, जब वो कमरे से बाहर निकले तब पूरे कमरे में धुआँ भरा रहता था.

amruta pritam kuchhnaya
tns.thenews.com.pk

फिर अमृता ने उस में से एक आधी सिगरेट उठाई और उसे जलाकर जब पीने लगी तो उन्हें ऐसा आभास हुआ की, साहिर उनके पास ही हैं और तब से अमृता को भी सिगरेट की आदत लग गई.

उन्होंने इस आत्मकथा में साहिर की भी कहानी बतायी है. साहिर ने उन्हें कहा था की,

जब वो दोनों लाहौर में थे तो वो हमेशा अमृता के घर के नजदीक एक पान की दुकान में हाथ में पान, सिगरेट या सोडे का ग्लास लिए हुए खड़े रहकर घंटों तक उसके घर के रास्ते के एक तरफ एक खिड़की की तरफ देखते रहते थे.

जब देश का विभाजन हुआ तब अमृता पति के साथ दिल्ली आ गई. उसके बाद साहिर भी मुम्बई आकर बस गये. ये भी एक कारण था दोनों के बीच दूरियाँ आने का.

फिर भी अमृता कोशिश करती रहीं. उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से साहिर के साथ के अनुभव लिखना शुरू किया. ‘इक सी अनीता’ नाम के कवितासंग्रह में से ‘दिल्ली दिया गलीयां’ नाम की कादंबरी में उसने अपने अनुभव लिखे.

‘आखरी आहट’ नाम का कथासंग्रह भी उन्होंने लिखा. उनके ‘सुनहरे’ इस कवितासंग्रह को ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ १९५६ में मिला. जो कवितासंग्रह उसने साहिर के लिये लिखा था.

amruta pritam kuchhnaya
thevirgin.home.blog

‘आखरी खत’ इस लघुकथा धारावाहिक १९५५ में एक साप्ताहिक उर्दू अख़बार में आती थी. पर साहिर का जब कोई जवाब नहीं आया तो वह निराश हो गई थी.

फिर एक दिन वह खुद ही साहिर से मिलने गई, तब साहिर ने कहा

”जब मैंने ‘आखरी खत’ पढ़ा तब मुझे बहुत खुशी हुई, मैं अपने दोस्त के घर भी गया ये बताने के लिये कि, ये मेरे लिये लिखा है, पर कोई मेरा मजाक ना उड़ाये इस डर से मैं चुप ही रहा.”

अमृता के पास जिस तरह याद स्वरुप सिगरेट थी, वैसे ही साहिर के टेबल पर एक कप था जो काफी दिनों से वहीं पड़ा हुआ दिख रहा था. जब उसके दोस्त ने वह कप उठाने की कोशिश की तो साहिर ने उन्हें हाथ नहीं लगाने दिया. क्यूँकि उस कप में अमृता ने चाय पी थी.

इसलिए उनकी प्रेम कहानी का प्रतीक है ये कप.

ये कहानी जानकर बहुत हैरानियत होती है क्यूँकि ये प्रेम कहानी मूक थी. शब्दों के भंडार से भरे हुए ये दोनों कलाकार एक शायर तो एक कवियत्री.. दोनों ही बोलकर अपने जज्बात बयाँ नहीं कर सके.

sahir pritam kuchhnaya
FILMIPOP Hindi

उनको अपनी ही भावनाएँ व्यक्त करने के लिये शब्द नहीं थे. पर उन्होंने जो अजर अमर गीत लिखे वो लोगों के दिल को छूने में कामयाब रहे….

‘कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है।
की जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिए।’

ऐसा एक बार तो भी कहना चाहिए था, तेजाब की गीत की तरह..अमृता को भी एक बार कहना चाहिए था, ‘कुछ मेरी सुनो, कुछ अपनी कहो, हो पास तो ऐसे चूप ना रहो’.

अगर ऐसा हुआ होता तो इस प्रेम कहानी ने अलग ही मोड लिया होता. ये कहानी असफल तो नहीं कही जा सकती पर अव्यक्त रही.

===

हमारे अन्य लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें: KuchhNaya.com | कॉपीराइट © KuchhNaya.com | सभी अधिकार सुरक्षित

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *