चुनौतीयों का सामना करते हुए सरिता गायकवाड़ ने जो किया वो काबील-ए-तारीफ है…

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सरिता गायकवाड़ एक ऐसी महिला जो कई लड़कियों के लिए एक बहुत बड़ी उदहारण है. सरिता ने न जाने कितनी ही लड़कियों को प्रेरणा दी होगी. एक छोटे से गांव की एक मजदूर की बेटी ने आज अपना ही नहीं बल्कि पूरे भारत का नाम रोशन कर दिया है.

सरिता का गुजरात के डांग जिले में- जहां ज्यादातर आदिवासी लोग रहते हैं, वहां खेतिहर मजदूरों के एक परिवार में जन्म हुआ था. ऐसे में जो सपने सरिता देख रही थी वह किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं थी.

महिला ४X४०० की रिले टीम के एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल जीतने के बाद टीम की सदस्य सरिता गायकवाड़ ने बड़ा नाम कमाया.

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सरिता और उसके सपने के बीच जो सबसे बड़ी बाधा थी वो है उसकी गरीबी, जिसका उसने जम कर मुकाबला किया. साथ ही सरिता के घरवालों ने भी उसे एक सफल एथलीट बनाने में बहुत संघर्ष किया.

दांग एक ऐसा गांव है जहां की, आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी. यहाँ तक की उस गांव में प्राथमिक सुविधाओं की भी कमी थी. आज के समय में जहा लोग दिन भर इंटरनेट पर लगे रहते है उस गांव में आज तक अखबार तक नहीं पहुंच पाया.

इतना ही नहीं उस गांव में न ही कोई सड़क है न ही परिवहन की कोई सुविधा. गांव से बाहर जाने के लिए गांव के लोगों को ४ से ५ किलोमीटर पैदल चल कर जाना पड़ता है, तब जाकर उन्हें बस मिलती है. गांव में बिजली तो है, लेकिन अनिश्चित है.

इसलिए यह कल्पना करना मुश्किल है कि, इस तरह के एक दूरदराज के गांव की एक लड़की ने न केवल एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया, बल्कि गुजरात और पूरे देश को गर्व करने के लिए स्वर्ण पदक भी जीता.

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सरिता की माँ रामुबेन और पिता लक्ष्मणभाई खेतिहर मजदूर हैं. दोनों ने ही अपने बच्चों को पालने और उनकी शिक्षा के लिए बहुत कष्ट का सामना किया है.

सरिता के मैडल जितने पर सरिता के भावुक पिता ने कहा की, ‘हमारे घर की आय कम थी और हमें चार बच्चों को पढ़ाना था. हमने उसको अच्छी शिक्षा देनी की पूरी कोशिश की और आज हमारे बच्चों ने हमारा सर गर्व से ऊँचा कर दिया है.’

सरिता ने डांग के पहाड़ी इलाकों में ट्रेनिंग की थी. जिससे सरिता का शरीर और मजबूत हो गया. सरिता ने बचपन से जितनी कठिनाइयों का सामने किया, इससे सरिता को मानसिक रूप से मजबूत बनने में मदद मिली.

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सरिता ने खो खो में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया. एथलेटिक होने से पहले सरिता ने राष्ट्रीय खेलों सहित कई प्रतियोगिताओं में भाग लिया.

सरिता ने स्कूल के समय एथलेटिक्स के बारे में कभी नहीं सोचा था. यह सफर तब शुरू हुआ जब सरिता ने ग्रेजुएशन के लिए कॉलेज में एडमिशन लिया. सरिता के कोच ने उन्हें ट्रैक रनिंग की सलाह दी.

जिसके बाद सरिता ने रनिंग शुरू की और खो खो की तरह रनिंग में भी सरिता को कोई टकर नहीं पता था. सरिता को आगे बढ़ने में उसके कॉलेज ने उसकी काफी मदद की. कॉलेज ने सरिता को आर्थिक रूप से तो मदद की ही. पर साथ ही सरिता को रनिंग के लिए जूते भी कॉलेज ने ही दिए.

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नडियाद स्पोर्ट्स अथॉरिटी ने सरिता के टैलेंट को पहचाना और उसे ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए चुन लिया गया. नडियाद में दो साल के ट्रेनिंग के बाद सरिता को नेशनल कैंपट पाटियाला में दाखिला लेने का मौका मिला.

सरिता ने राष्ट्रीय स्तर के ट्रैक और फील्ड इवेंट्स में जबरदस्त प्रदर्शन किया और आखिर कार सरिता को ऑस्ट्रेलिया में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए चुन लिया गया.

हालांकि सरिता कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतने में असफल रही, लेकिन अंतरराष्ट्रीय लेवल पर उसका प्रदर्शन अच्छा रहा. जिसके बाद सरिता को एशियाई खेल में एक बार और मौका मिला.

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इस बार सरिता को सफलता मिली और उसने अपने साथ पुरे देश का नाम रोशन किया. सरिता गायकवाड़ ने आखिरकार २०१८ जकार्ता एशियाई खेलों में ४x४०० मीटर टीम रिले में स्वर्ण जीतकर खुद को साबित कर दिया.

सरिता गुजरात की पहली लड़की है जिसने स्वर्ण पदक हासिल किया है. उसके इस कर्तबगारी के लिए उसे ‘डांग एक्सप्रेस’ के नाम से भी जाना जाता है.

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२०२० ऑलिंपिंक प्रतियोगिता में भारत की सारी दारोमदार सरिता पर टिकी रहेगी. उसके इस सफर के लिए उसे शुभकमनाएं…

इतनी कठिनाई भरी हालत से झूझकर सरिता ने जो संघर्ष किया है वो बेहद प्रेरणादायी है.

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