एक ऐसा योद्धा जिसने दर्दनाक मौत कबूल की.. पर इस्लाम नहीं..!

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मुगल बादशाह औरंगजेब के शासन और करतूतों को हम इतिहास में पढ़ ही चुके है. मगर क्या आप जानते है उसकी एक करतूत ऐसी भी थी, जिसे जानकर आपके आखों से आंसू आ जाएंगे.

जी हां हम आज आपको इतिहास के पन्नो से मराठा सम्राट संभाजी और मुगल बादशाह औरंगजेब से जुडी दर्दभरी कहानी लेकर आये हैं.

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संभाजी राजे भोंसले, छत्रपति शिवाजी महाराज के सबसे बड़े पुत्र थे. 14 मई, 1647 में जन्मे संभाजी, शिवाजी की पहली पत्नी, सईबाई की संतान थे.

संभाजी ने बचपन में ही अपनी मां को खो दिया था और शिवाजी की मां, जीजाबाई ने ही उनकी परवरिश की थी. शिवाजी अक्सर राज्य के कामकाज से बाहर ही रहे और संभाजी दादी के साथ ही पले-बढ़े.

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राजनीतिक गठबंधन के फलस्वरूप बचपन में ही उनका विवाह, पिलाजीराव शिरके की पुत्री जीवुबाई(येशुबाई) से कर दिया गया.

पिता के पास न रहने से संभाजी बहुत छोटी ही उम्र में राजनीतिक षड़यंत्रों का शिकार हुए.

1680 में रायगढ़ किले में शिवाजी के देहांत के बाद, मराठा साम्राज्य दोबारा ख़तरे में आ गया था. मराठियों के सिर पर कोई साया नहीं था. राजसिंहासन भी पारिवारिक मतभेदों के कारण बिना राजा के, विदेशियों की नज़रों का शिकार बन गया था.

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जब मराठों ने मुगलों के नाक में दम कर रखा था:-

उस दौरान औरंगजेब की बर्बरता चरम पर थी.

छत्रपति संभाजी राजे भोसले या संभाजी जिनका शासन काल  1657 से 1689 तक रहा. वे मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी के उत्तराधिकारी थे.

अपने समय में मराठाओं के सबसे प्रबल शत्रु मुगल बादशाह औरंगजेब, बीजापुर की आदिलशाही और गोवलकोंडा का शासन हिन्दुस्तान से समाप्त करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही.

संभाजी अपनी शौर्यता के लिये काफी प्रसिद्ध थे.

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संभाजी महाराज ने अपने कम समय के शासन काल के दौरान 120 युद्ध किये और एक भी युद्ध में परास्त नहीं हुए.

जब संभाजी ने संभाली गद्दी:- 

1680 में छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्य के बाद संभाजी ने गद्दी संभाली. अपनी प्रबल शौर्य के कारण उन्होंने मुग़ल बादशाह औरंगजेब की नाक में दम करना शुरू कर दिया.

उनके पराक्रम की वजह से परेशान हो कर दिल्ली के बादशाह औरंगजेब ने कसम खाई थी कि, जब तक छत्रपती संभाजी पकडे नहीं जायेंगे, वो अपना मुकुट सर पर नहीं धारण करेगा.

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शिवाजी के दुसरे पुत्र राजाराम को छत्रपति बनाने में असफल रहने वाले राजाराम समर्थकों ने औरंगजेब के पुत्र अकबर को राज्य पर आक्रमण करने के लिए उकसाया. इसके लिए उन्होंने उसे खत लिखा था, जिसमे औरग़ज़ेब पुत्र अकबर को मुग़ल साम्राज्य का शासक बनाने की गुजारिश की गई थी.

किन्तु छत्रपति संभाजी के पराक्रम से परिचित और उनका आश्रित होने के कारण अकबर ने वह पत्र छत्रपति संभाजी को भेज दिया.

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इस राजद्रोह से क्रोधित छत्रपति संभाजी ने अपने सामंतो को मृत्युदंड दिया.

जब अपनों ने की गद्दारी:-

जिस तरह कुछ मराठा सरदारों ने राजद्रोह कर संभाजी को औरंगजेब का बंदी बनने पर मजबूर किया. वो जानकर शायद आपका दिल दहल जाए.

संभाजी ने 1683 में पुर्तगालियों को पराजित किया. इसी समय वह किसी सियासी वजह से संगमेश्वर में रहे थे. जिस दिन वो राजधानी रायगड के लिए प्रस्थान करने वाले थे, उसी दिन कुछ ग्रामीणों ने अपनी समस्या उन्हें बतायी.

जिसके चलते छत्रपति संभाजी महाराज ने अपने साथ केवल 200 सैनिक रख बाकी सेना को रायगड भेज दिया.

उसी वक्त उनके साले गनोजी शिर्के, ने गद्दारी कर मुग़ल सरदार मुकरब खान के साथ गुप्त रास्ते से 5000 के फ़ौज के साथ संभाजी पर हमला कर दिया.

यह वह रास्ता था जो सिर्फ मराठों को पता था. इसलिए संभाजी महाराज को कभी नहीं लगा था की शत्रु इस तरफ से आ सकेगा.

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उन्होंने लड़ने का प्रयास किया किन्तु इतनी बड़ी फ़ौज के सामने 200 सैनिकों का साहस काम कर न पाया और अपने मित्र तथा एकमात्र सलाहकार कविकलश के साथ वह बंदी बना लिए गए.

क्रूरता की हदे की पार कर दिए शरीर के टुकडे-टुकडे:-

संभाजी से बुरी तरह खफा औरंगजेब ने अपने कब्जे में उन्हें पाकर क्रूरता और अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी. दोनों की जुबान कटवा दी, आँखें निकाल दी.

उनपर मुस्लिम धर्म को ग्रहण करने का दबाव डाला गया. बदले में औरंगबजेब ने उन्हें जान बख्शने का भी वचन दिया.

लेकिन औरंगजेब का इस प्रस्ताव जो वीर संभाजी ने ठुकराया.

11 मार्च 1689 हिन्दू नववर्ष दिन औरंगजेब ने संभाजी और उनके साथी के शरीर के टुकडे-टुकड़े करवा दिए.

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हत्या से पूर्व औरंगजेब ने छत्रपति संभाजी महाराज से कहा की, मेरे चार शहजादों में से एक भी तुम्हारे जैसा होता तो सारा हिन्दुस्थान कब का मुग़ल सल्तनत में समाया होता.

जब छत्रपति संभाजी महाराज के टुकडे तुलापुर की नदी में फेंकें गए तो उस किनारे रहने वाले लोगों ने शव के टुकड़ों को इकठ्ठा कर के सिला के जोड़ दिया (इन लोगों को आज ” शिवले ” इस नाम से भी जाना जाता है).

शरीर के अंगों को आपस में जोड़े जाने के बाद उनका विधिपूर्वक अंतिम संस्कार किया.

जब मराठों में जागा आक्रोश:-

औरंगजेब ने सोचा था की मराठा  साम्राज्य छत्रपति संभाजी महाराज के मृत्यु के बाद ख़त्म हो जाएगा. लेकिन हुआ उल्टा ही..छत्रपति संभाजी महाराज के हत्या की वजह से सारे मराठा एक साथ आकर लड़ने लगे. अत: औरंगजेब को दक्खन में ही प्राणत्याग करना पड़ा. उसका दक्खन जीतने का सपना इसी भूमि में दफन हो गया.

ऐसा शुर पराक्रमी योद्धा जिसने धर्म रक्षा हेतु अपनी जान तक न्योछावर की, उन्हें शत शत नमन..

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