भीख मांगने वाला कुछ इस तरह बना करोड़पति !

हम नौकरी छोड़कर अपने सपनों की ओर दौड़ने वाले युवाओं या उद्यमियों की अद्भुत कहानियां  कई बार सुनते है. परंतु कॊई ऐसी कहानी रोजाना नहीं सुनते जो हमे झकझोर कर रख दे, अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रेरणा दें. आज हम एक ऐसे शख्स ‘उद्योगपती रेणुका आराध्य’ की संघर्षगाथा जानेंगे. एक ऐसा व्यक्ति जिसने गुजरे जमाने में सड़कों पर भीख मांगता था, वह व्यक्ति आज ‘प्रवासी कॅब्स’ नामक तीस करोड रूपए मूल्य के कंपनी का मालिक है.

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रेणुका बेंगलोर के नजिक अनैकल तालुक में गोपसंद्रा नामक गाँव में रहते थे. उनके पिताजी मंदिर में पुजारी थे. वह अक्सर अपने पिता के साथ पड़ोसी गाँव में भिक्षा मांगने जाते थे. भिक्षा में मिला हुआ धान बेचकर उन्ही पैसों के साथ अपना गुजारा करते थे. जब हम किसी भी समस्या का सामना करते हैं तो उस वक्त हम थका हुआ महसूस करते है. किंतु रेणुका ने किन परिस्थितीओं का सामना किया है हम कभी कल्पना भी नहीं कर सकते.

कक्षा ६ पूरा करने के बाद उनके पिता ने उन्हें दूसरों के घरों में घरेलू सहायक के रूप में रखा. वास्तव में उनके शिक्षक ने दसवीं कक्षा तक स्कूल की फीस का भुगतान किया और बदले में उन्हें  शिक्षक के घर के काम करने पड़े. उसने एक बूढ़े व्यक्ति की देखभाल की जिसे गंभीर त्वचा की बीमारी थी. जिन्दगी जैसे-तैसे कट रही थी.  उन्हें आगे के अध्ययन के लिए एक छात्रावास में भर्ती कराया गया था लेकिन उन्हें वहां पर अध्ययन करना कठिन था.  छात्रावास में बच्चों को एक दिन में दो भोजन दिए जाते थे. एक सुबह और एक रात में इसलिए वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सके क्योंकि उन्हें  लगातार भूख लगती थी और खाली पेट पढ़ाई भी तो मुमकिन नहीं थी.

एक समय था जब उन्होंने संस्कृत और वेदों को पढ़ा, ताकि वह अपने वरिष्ठ नागरिकों के साथ कई शादी और पूजा समारोहों में शामिल होकर सिर्फ खाकर अपना पेट भर सकें. वह 10 वीं कक्षा में विफल रहे और अपने पिता की मृत्यु के बाद अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारियां उसके कंधे पर गिर गईं और उन्हें घर वापस लौटना पड़ा.

वह हाथ आये किसी भी काम को छोटा न समझकर सारे काम पुरी लगन से करते रहे. उन्होंने एक Adlabs शाखा में सफाई कर्मचारी के रूप में काम किया, श्याम सुंदर ट्रेडिंग कंपनी में सहायक के रूप में काम किया, एक सुरक्षा गार्ड के रूप में काम किया, वह एक माली थे. यहां तक ​​कि चालक के रूप में ३०० मृत शरीर को में लेकर भी गये है.

 

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क्योंकि वह व्यापार के विभिन्न पहलुओं से परिचित थे. अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने के विचार उनके दिमाग में उमड रहा था. उन्होंने सूटकेस और बैग के लिए कवर बनाकर बेचने का निर्णय लिया और अपनी साइकिल पर ग्राहकों की खोज पर शहर में वह निकल पड़ते हालांकि यह व्यवसाय से उनको नफा मिलने के बजाय काफी नुकसान उठाना छोड़ा.

ऐसे वक्त पर  कोई भी व्यक्ति अपने नसीब का दुखडा रोता लेकिन उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोडा. तुरंत ड्राइवर बनने का फैसला किया. वह अपने खराब ड्राइविंग कौशल की वजह से चालक की नौकरी कुछ ही समय में गंवा बैठे. लेकिन बस एक टैक्सी ऑपरेटर के जरिये उन्हें काम मिला. उन्होंने पर्यटकों और अन्य स्थानों के लिए ड्राइविंग शुरू कर दी. वह मेहनत और पुरी लगन से काम करते थे. पर्यटकों को पर्यटनस्थल की सैर कराते थे, “ग्राहकों को खुश रखना सबसे महत्वपूर्ण होता है”, यह वो जानते थे और कुछ ही समय में उनके काम करने के अंदाज से उन्होंने ग्राहकों के दिल जीत लिये.

वह और उनकी पत्नी जो परिधान कंपनी में एक दर्जी के रूप में काम करती थी. दोनों कुल मिलाकर नौसॊ रुपये कमाते थे.  उन्हें विदेशी पर्यटकों को घुमाने का अवसर मिला और वह उत्साहित थे क्योंकि उन्हें डॉलर में अच्छी खासी टीप मिलता. जमा की हुई राशि में अपनी पत्नी के प्रॉव्हिडंट फंड को जोड़कर उन्होने “शहर सफारी” नामक अपनी कंपनी शुरु कर दी. एक ड्राइवर के रूप में वह एक प्रबंधक बनने का सपना देखते थे और यह सपना जल्द ही सच हो गया.

जब उनके पास  तीन कारें थीं उस वक्त उन्होंने एक कंपनी ‘प्रवासी कैब्स’ नाम के तहत पंजीकृत की . २००६ में उन्होंने घाटे में चल रही इंडियन सिटी टैक्सी को खरीदा क्योंकि इसमें 30 से अधिक कैब थे. रेणुका को कंपनी को खरीदते वक्त अपनी सारी कारों को बेचना पड़ा. इसी समय उन्होंने अपनी नई कंपनी का नाम प्रवासी कैब्स में बदल दिया और इसी तरह एक उद्यमी के रूप में उनकी यात्रा शुरू हुई.

व्यापार में पूर्व अनुभव के साथ एक उद्यमी के रूप में  उन्हें कई जटिलताओं का सामना करना पड़ा. उनका पहला ग्राहक अमेझॉन इंडिया था और वह अपने विकास को मजबूत करने के लिए अमेझॉन को श्रेय देते है. धीरे-धीरे उन्होंने वॉलमार्ट, अकमाई, जनरल मोटर्स और अन्य जैसे ग्राहकों को जोड़ना शुरू कर दिया. इस समय के दौरान उनके टीम में कोई बिक्री टीम या विपणन टीम नहीं थी.

वो अंग्रेजी भाषा से अवगत नहीं थे परंतु पर्यटकों के साथ  बातचीत से, अंग्रेजी अखबार पढ़कर और इसके बारे में अनुच्छेद लिखने से उन्होने अंग्रेजी सीख ली. व्यापार में कड़ी स्पर्धा का सामना करना पड़ता है ओला, उबेर जैसी कंपनियों से उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करते हुए अपनी २०० कैब को खोना पडा. उनके पास कारों का अच्छा बेड़ा था. इसलिए वह इस स्थिति से बचने में सफल रहे. आज उनकी कंपनी के पास १००० से ज्यादा कार हैं एक बार जब उनकी कंपनी १०० करोड़ रुपये का पार करती है तो वह आईपीओ के लिए जाने का सपना देख रहे है.

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आज वह तीन शुरुआती कंपनीयोंके निर्देशक हैं.  महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से  महिला ड्राइवरों को प्रोत्साहित किया है. उनकी कंपनी ने करवार में प्रवासीओं के लिए एक अखिल महिला कॉल सेंटर भी बनाया है. प्रवासी कैब्स का कारोबार आज अच्छी तरह से चल रहा हैं और इसकी सफलता के पीछे का आदमी प्रेरणा से कम नहीं है. आखिरकार आप एक ऐसे व्यक्ति के बारे में कितनी बार सुनते हैं जो एक बार एक सुरक्षा गार्ड था, लेकिन आज 20 लाख रुपये से अधिक कीमत की कार चलाता हैं.

जिन्दगी में कितनी भी मुश्किलें आये उनका डटकर सामना करना चाहिए यह सिख आज हमें मिली हैं.

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