दिन में दो बार गायब हो जाता है शिवालय !

दुनिया में भगवान भोले नाथ के कई मंदिर और शिवालयों से आप परिचित होंगे पर क्या आप जानते है. भारत में एक ऐसा भी मंदिर है जिसका जलाभिषेक करने खुद समुद्र देवता आते है . ये मंदिर प्राकृतिक कारणों से हर रोज सुबह और शाम के वक्त कुछ पल के लिए जल समाधि ले लेता है. जो पूरी तरह से आखों से ओझल हो जाता है. तो चलिए जानते इसके पीछे की कहानी.

स्तंभेश्वर महादेव मंदिर (गुजरात)

stambheshvar tampa kuchhnayal

हम बात कर रहे हैं गुजरात के स्तंभेश्वर महादेव मंदिर की, जो रोजाना दिन में दो बार (सुबह और शाम) को कुछ देर के लिए आंखों से ओझल हो जाता है. यह मंदिर गुजरात के भरुच जिले में बड़ोदरा से 40 मील की दूरी पर अरब सागर के कैम्बे तट पर स्थित है. इस तीर्थस्थल का उल्लेख ‘श्री महाशिवपुराण’ में रुद्र संहिता भाग-2, अध्याय 11 में भी किया गया है. मंदिर की खोज आज से लगभग 150 वर्ष पूर्व की हुई थी. मंदिर में विराजमान शिवलिंग लगभग 4 फुट ऊंचा तथा दो फुट के व्यास का है. मंदिर को देखते समय उसके पीछे अरब सागर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है.

भगवान कार्तिकेय के पश्चाताप से निर्मित हुआ मंदिर

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शिवशंभु के पुत्र कार्तिकेय स्वामी छह दिन की आयु में ही देवसेना के सेनापति नियुक्त कर दिए गए थे. इस समय ताड़कासुर नामक दानव ने देवसेना को आतंकित कर रखा था. देव-ऋषि-मुनि, आमजन सभी बेहद परेशान थे. कार्तिकेय स्वामी ने अपने बाहुबल से ताड़कासुर का वध कर दिया. वध के उपरांत कार्तिकेय स्वामी को ज्ञात हुआ कि ताड़कासुर भोलेनाथ का परम भक्त था.

यह जानने के बाद व्यथित कार्तिकेय स्वामी को प्रभु विष्णु ने कहा कि आप वधस्थल पर शिवालय बनवाएँ. इससे आपका मन शांत होगा. कार्तिकेय स्वामी ने ऐसा ही किया. समस्त देवगणों ने एकत्र होकर महिसागर संगम तीर्थ पर विश्वनंदक स्तंभ की स्थापना की. पश्चिम भाग में स्थापित स्तंभ में भगवान शंकर स्वयं विराजमान हुए. तब से ही इस तीर्थ को स्तंभेश्वर कहते हैं. यहाँ पर महिसागर नदी का सागर से संगम होता है.

समुद्र देवता करते है जलाभिषेक

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समुद्र के इस किनारे पर दो बार ज्वार-भाटा आता है. ज्वार के समय समुद्र का पानी मंदिर के अंदर आता है और शिवलिंग का अभिषेक दो बार कर वापस लौट जाता है. लोक मान्यता है कि स्तंभेश्वर मंदिर में स्वयं शिवशंभु विराजे हैं, इसलिए समुद्र देवता खुद उनका जलाभिषेक करते हैं. ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है. मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि यह प्रक्रिया सदियों से सतत चल रही है. हमने इस नियम को टूटते कभी नहीं देखा. मंदिर के पुँजरियों का कहना है ज्वार-भाटा किस समय आता है, यह बताने के लिए हमने खासतौर पर परचे बँटवाए हैं, ताकि प्रभुदर्शन का लाभ लेने आए श्रद्धालु परेशान न हो.

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