मनचाहे पैसे छापकर, देश धनवान क्यों नही हो सकता? पढीए!

गरिबी केवल हमारे ही नही बल्कि दुनिया के कई सारे देशों की परेशानी है. दुनिया में ऐसे अनेक राष्ट्र है जिनकी स्थिती देखने से यह ध्यान में आता है कि भारत में हम कई गुना ज्यादा खुश हैं. ‘देश गरीब’ का अर्थ है उस देश के पास पैसे (सरकारी खजाने में) न होना, और उसके नागरिकों के पास पैसे न होना. बहुत सारे लोगों के मन में विचार आता है, की हर देश का अपना-अपना एक चलन होता है और उस चलन की छपाई उसी देश में होती है. इसका अर्थ है वह देश पैसों की मनचाही राशी छापकर भी वह देश या वहा रहनेवाली जनता गरीब क्यों? हर देश के पास पैसे छापनेवाली मशीन रहते हुए भी देश जितने चाहे उतने पैसे छाप कर लोगों में क्यों नही बाट देता? ताकि देश अपने आप धनवान हो जाए?

ऐसे सवाल हमारे मन में आते हैं और वे आना स्वाभाविक है, लेकिन इस सबका उत्तर यह है –

‘बिल्कुल नहीं… मनचाहे पैसे छापकर कोई भी देश धनवान नहीं हो सकता…’

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यह सही है की मंदी के काल में देश ज्यादा नोटों की छपाई करते हैं. लेकिन वे भी केवल तभी किया जाता है जब बहुत ज्यादा गंभीर स्थिती आ जाए. परन्तु ऐसा करना भी देश की आर्थिक स्थिती के लिए धोकादायक साबित होता है क्योंकि मर्यादा से ज्यादा चलन की छपाई करने से देश में तीव्र गति से महंगाई पैदा हो सकती है.

ऐसी अवस्था का सबसे अच्छा उदाहरण देखना हो, तो चलो हम जिम्बाब्वे की तरफ देखते हैं.

2000 साल में इस देश की महंगाई एक वर्ष में 231 दशलक्ष प्रतिशत (231,000,000%!!!) इतनी बढ गई.

 

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जिम्बाब्वे सरकार ने 2,00,000 डॉलर के नोट छापना शुरु कर दिया. मजे की बात यह है कि उसकी कीमत हमारे 2 रुपयों जितनी ही थी. उसके बाद 22 दिसंबर को उन्होंने 5,00,000 डॉलर की नोट बाजार में लायी.

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उसके बाद आई 7,50,000 डॉलर की नोट…!

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लेकिन जिम्बाब्वे सरकार की इकोनॉमिक मूर्खता यही पर नही रुकती… जनवरी में तो जिम्बाब्वे सरकार ने हद करते हुए 10 मिलियन अर्थात्‌ 10 दशलक्ष डॉलर की नई नोट बाजार में लायी.

और मजे की बात यह की हमारी 500 रुपयों की नोट भी इन 10 दशलक्ष डॉलर की नोट से 10 गुना ज्यादा मूल्यवान थी. मतलब अगर आपके पास 65 अरब जिम्बाब्वे डॉलर होंगे तो भी उसकी भारत में कीमत केवल 13,000 से 14,000 रुपयों के आसपास ही होगी. मतलब सिर्फ नाम के अरबपती- जेब में केवल हजार ही! तब जिम्बाब्वे का एक्सचेंज रेट था 1 डॉलर के लिए 25 दशलक्ष जिम्बाब्वे डॉलर…!

 

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देखिए यह शर्ट कितना सस्ता है न… कीमत केवल 3 बिलियन डॉलर…!

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आखिर में आयी सबसे बडी 100 अरब डॉलर की नोट… पर दुर्भाग्य से इस 100 अरब डॉलर में जिम्बाब्वे की जनता खरीद सकती थी केवल 3 अंडे!

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देखा… जब कोई देश मनचाहे पैसे छापता है तब उसका ‘जिम्बाब्वे’ हो जाता है…!

अब सवाल यह है की केवल अमर्याद नोट छापने से यह महंगाई कैसे निर्माण होगी?

अगर सरकार ने मनचाहे राशी में पैसे छापें, और जनता में बांट दिए, तो उसका असल में परिणाम क्या होगा?

जब आपकी कमाई बढ़ती है, तब आपके खर्चे भी बढते हैं, और ‘स्टेटस’ के हिसाब से जरूरतें भी बढती हैं.

अब ऐसा सोचिए की आप टीव्ही पर खबरें देख रहें हैं और अचानक एक ब्रेकिंग न्यूज आती है की हर नागरिक को 1 करोड बाटने का निर्णय ले लिया गया है – ताकि सारे आराम से खा-पीकर के सुखी से रह सकें.

दूसरे ही पल में आपको सुचाना मिलती है की आपके खाते में सरकार की तरफ से 1 करोड रुपया जमा कर दिया गया है. बस! फिर तो खुशियां ही खुशियां… हर जगह…

आप एक झटके में करोड़पति हो गए. अब आपके मन में ख्याल आएगा की ‘अब तो मै धनवान हो गया हूं, अब मै जो चाहूं खरीद सकता हूं’… और आप सिधे शॉपिंग के लिए निकल पडते हैं.

ठीक यही विचार हर कोई करेगा. अचानक वस्तूंओ की मांग बढेगी, क्योंकि – अब हर किसीके पास पैसे होने के कारण हर कोई खर्चा करने के लिए उत्तेजित होगा. पर इसी समय, हमारे चलन का मूल्य एक झटके में नीचे जाएगा.

चलन का मूल्य क्या होता है? वह क्यों नीचे जाएगा?

और आसान करके बताता हूं.

कल्पना करें की आपको घर लेना है. पहले उस घर की कीमत थी 30 लाख रुपये. पर तभी आपके पास पैसे नही थे. पर अब सरकार की तरफ से 1 करोड रुपये मिलने की वजह से आप सीधे उस बिल्डर के पास पहुंचे और – आप देखते हैं की आपकी तरह हजारों लोग उसके घर के बाहर खडे हैं…!

हर कोई चिल्ला रहा है ‘मुझे घर दो.. मुझे घर दो..!’

इतनी भीड़ देखकर बिल्डर तो डर जाता. लेकिन एक ही घर के लिए हजारों लोग लड़ रहे देख वह खुश होता है और सीधे घर की कीमत 75 लाख कर देता है.

इस उदाहरण से आप बाजार की हर वस्तू की भयानक मात्रा में बढ़ने वाली कीमत का अंदाजा लगा सकते हैं.

सारांश में – डिमांड – सप्लाई, मांग – आपूर्ति का नियम

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मांग बढती है तो उसका स्वाभाविक प्रभाव कीमत पर पड़ता है और मांग के सा- साथ कीमत भी बढ़ने लगती है.

लोगों को लगेगा की पैसे आनेसे वे धनवान हो गए हैं. लेकिन उनके ध्यान में आने को समय लगेगा की जब उनके पास पैसे नही थे तब उस वस्तू की कीमत केवल 100 रुपये थी लेकिन अब वही वस्तू 500 रुपयों की हो चुकी है. महंगाई बढ़ने से लोगों का पैसा भी जल्दी खत्म हो जाएगा और इसके परिणामस्वरूप महंगाई के कारण गरीबी के हालात पैदा हो जाएंगे.

मतलब जहा से शुरु किया वही पर आके रुकने जैसा है… यह देखकर सरकार ने वापस पैसे छापे और फिरसे लोगों में बांटे तो स्थिती और भी बत्तर जो जाएगी. फिर दिए हुए 1 करोड रुपयों को 10,000 रुपयों की भी कीमत नही रहेगी…!

बजाय इसके, जिस देश के लोग 50 रुपया किलो के बदले में 5 रुपया किलो से आलू खरीद रहें हो वह देश सही मात्रा में धनवान है. मतलब लोगों का पैसा उन्हे उस देश के सरकार योग्य रूप से इस्तेमाल कर रही है.

पर इसी सरकार ने ऊपर की तरह लोगों को 1-1 करोड बाट दिए तो फिर उन्ही लोगों को 100 रुपया किलो के भाव से आलू खरीदने पडेंगे. और यह हरगिज देश के हित में नही होगा.

क्या समझे?!

 

2 thoughts on “मनचाहे पैसे छापकर, देश धनवान क्यों नही हो सकता? पढीए!

  • February 17, 2017 at 5:06 pm
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    Very nice!
    Congrets

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  • June 3, 2017 at 11:27 pm
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    thanks fo valuable information

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