जहां लड़कियों को नहीं मिलते शादी के लिए कुंवारे लड़के

भारत जैसे देशों में बेटी बचाओं अभियान के तहत बेटियों की संख्या बढ़ाने का प्रयास किया जाता है. मगर एक ऐसा भी देश है जहां कुंवारी लड़कियों को शादी के लिए कुंवारे लड़के नहीं मिलते है. जी हाँ हम बात कर रहे हैं ब्राजील के नोइवा दो कोरडेएरो कस्बे की. जहाँ करीब 600 महिलाओं वाले इस गांव में अविवाहित पुरुषों का मिलना बहुत मुश्किल है और शादी के लिए यहां की लड़कियों की तलाश अधूरी है.

समाज में कहते हैं कि हर औरत पुरुष के बिना अधूरी है और हर पुरुष औरत के बिना अधूरी है. शादी एक शब्द है जो किसी भी लड़की के चेहरे पर ख़ुशी ला देता है, क्योंकि शादी के बाद ही असल मायने में लड़की का अस्तित्व पता चलता है.

हर माँ बाप अपने बच्चे के लिए अच्छे से अच्छा लड़का और लड़की चुनते हैं क्योंकि शादी न केवल दो लोगों का मिलन है बल्कि ये दो परिवारों का भी मिलन होता है. ऐसे में अगर आपको यह मालूम पड़े कि दुनिया में एक ऐसी भी जगह है जहाँ माता पिता को अपनी बेटी के लिए कुंवारे लड़के नहीं मिलते है जिसकी वजह से उन्हें कुछ ऐसा करना पड़ जाता है जिसे सुनकर आप हैरान रह जायेंगे.

जब नहीं मिलते कुवारें लड़के तो विवाहित मर्द से कर दी जाती है शादी 

गाँव की जहां 18 से 30 साल तक की लड़कियों की संख्या पुरुषों के मुकाबले अधिक है. ऐसे में जब माता पिता को अपनी बेटी के लिए कुवारा लड़का नहीं मिलता है तो वो लोग मजबूरन शादीशुदा मर्दों के साथ ही अपनी बेटियों की शादी कर देते हैं. यहाँ इस गाँव में हर लड़की अपनी शादी के लिए तरसती है. कई बार तो इस गाँव में पुरुषों की कमी होने की वजह से यहाँ की लड़कियों को पूरी जिंदगी बिना शादी के की रहना पड़ जाता है.

आजीवन रह जाती है लड़कियाँ कुंवारी 

इस गाँव में लड़कों की संख्या लड़कियों के मुकाबले बेहद कम है. आकड़ों की माने तो यहाँ करीब 600 महिलाओं की आबादी वाली इस छोटी सी जगह पर करीब 300 से ज्यादा कुवारी लड़कियों को अपनी शादी के लिए लड़के ही नहीं मिल पाए हैं अब तक, जिसकी वजह से ये लड़कियां अभी तक कुवारी हैं या फिर उन्होंने शादीशुदा मर्द से ही शादी कर ली है.

वही इस गाँव के बारे में यह भी कहा जाता है कि इस गाँव की लड़कियां चाहती हैं कि शादी के बाद लड़का उनके साथ इसी गांव मे आकर रहे और उनके काम को संभाले. इस गाँव में खेती इस गाँव के पुरुष नहीं बल्कि खुद महिलाएं ही करती हैं, क्योंकि यहाँ के पुरुष गांव से दूर शहर मे रहते हैं.

गाँव में है महिलाओं का वर्चस्व 

इस कस्बे की पहचान मजबूत महिला समुदाय की वजह से है. इसकी नींव मारिया सेनहोरिनहा डी लीमा ने रखी थी, जिन्हें कुछ वजहों से 1891 में अपने चर्च और घर से निकाल दिया गया था. सन  1940 में एनीसियो परेरा नाम के एक पादरी ने यहां के बढ़ते समुदाय को देखकर यहां एक चर्च की स्थापना की. इतना ही नहीं उसने यहां रहने वाले लोगों के लिए शराब ना पीने, म्यूजिक न सुनने और बाल न कटवाने जैसे तरह-तरह के नियम कायदे बना दिए. जल्द ही सन 1995 में पादरी की मौत के बाद यहां की महिलाओं ने फैसला किया कि अब कभी किसी पुरुष के जरिए बनाए गए नियम-कायदों पर वो नहीं चलेंगी. तभी से यहां महिलाओं का वर्चस्व है.

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